Tuesday, September 14, 2010

"चुनाव पद्धति और प्रजातंत्र"

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की बात प्रजातंत्र करता है | पर संविधान के सारे प्रावधान स्वतन्त्रता घाती एवं पक्षपाती हैं | "पार्टीवाद"  चुनाव का आधार सत्य ही पक्षपाती, दूसरों की स्वतंत्रता हनन करनेवाला, अँधा करनेवाला प्रावधान है | "चुनाव" का मूल उद्देश्य पद की गरिमा, उत्तरदायित्व, उच्चता , अधिकारों की न्यायपूर्वक निर्वहन  हेतु उपयुक्ततम , योग्यतम व्यक्ति चुनना है | इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए हमेशा पद से उच्च स्थिति रखती एक समिति परीक्षा, गहन आकलन, साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा श्रेष्टतम का चुनाव करती है | प्रजातंत्री चुनाव उपरोक्त सटीक चुनाव का कचूमर से भी अधिक चटुमर निकाल देता है | योग्यों द्वारा वैज्ञानिक परीक्षा चुनाव की आत्मगत शर्त है | प्रजातंत्री चुनाव में इस मूल या आत्मगत शर्त को ही नकार दिया है | औसत जनता उच्चतम, श्रेष्ठतम पद हेतु चयन करेगी.. कितना हास्यास्पद प्रावधान है जो "उच्च योग्यताधारी शिक्षित अनुभव-दक्ष" लोगों को पहले ही बहार कर देता है की वे औसत नहीं हैं | जनता की औसत भावना को वैज्ञानिकता, उच्च प्रत्यय समझते ही नहीं हैं | वह श्रेष्ठ आकलन करने की योग्यता ही नहीं रखती है | जनता बेशक "जन-प्रिय" चुनेगी | पर जनता को "जन-प्रिय" वही होगा जो उनकी मान्यताओं को मान्य करेगा | क्या जो स्वयं अंधे हों और अंधी मान्यताओं को जी रहे हों, कभी आँखवाले को अपना नेता चुनेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर एच. जी. वेल्स के उपन्यास "अंधों के देश" (कंट्री ऑफ़ ब्लाइंड्स) में सटीक दिया है | अंधों के देश के डॉक्टर आँखों को दोष बताते उस का ऑपरेशन कर देंगे या उस को पागल करार दे देंगे | प्रजातंत्री व्यवस्था में इतिहास गवाह है नव-चिंतन, श्रेष्ट-चिंतन युक्त लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है | जनता चुनाव पद्धति योग्यता की हत्यारी है और अयोग्यों, अंधों, अंधविश्वासियों, नाटकबाज, धूर्तों के चुने जाने की संभावना से भरी दुर्व्यवस्था का नाम है | इसलिए प्रजातंत्र हत्या जरूरी है |

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