Tuesday, November 2, 2010

“जगत और मानव”

1)    जगत मानव समूह है। मानव अकेला है। जगत सदायी है। मानव अस्थाई है। जगत श्रेष्ठ नहीं हो सकता। मानव श्रेष्ठ हो सकता है। जगत को श्रेठ होने में लम्बा समय लगता है। जगत को पतित होने में भी समय लगता है। मानव के पतित होने में कम समय लगता है।
2)    समाज के तीन घटक होते हैं। एक श्रेष्ठ, दो औसत, तीन घटिया। इसमें घटिया करीब़-करीब़ चालीस प्रतिशत, औसत करीब़ पचास प्रतिशत और श्रेष्ठ करीब़ दस प्रतिशत होते हैं।
3)    याद रखो तुम श्रेष्ठ घटक में शामिल हो। तुम्हें जीवन में औसत घटक और घटिया घटक की अनचाही बातें सुननी पड़ सकती हैं।
4)    बूढ़े, बालक और गधे की कथा तुमने पढ़ रखी है। बूढ़े एवं बालक को जनता के औसत और घटिया समूह ने अन्त में गधे को ढोकर ले जाने के लिए बाध्य कर दिया था। याद रखो बूढे के गधे पर बैठने पर उसे “कैसा निर्दयी” कहा। बच्चे के गधे पर बैठने से उसे ‘स्वार्थी’ कहा। और दोनों के गधे पर बैठने से उन्हें “दया-ममता से रहित” कहा था। यह सुन दानों ने गधे को जब उठाकर चलने लगे तो इसी जनता ने उनकी ‘गधा’ कहकर हंसी उड़ाई थी। औसत दुनियां + घटिया दुनियां के राज्य को प्रजातन्त्र कहते हैं। दुनियां के अनुसार चलोगे तो गधे ठहरोगे।
5)    उपरोक्त कथा में सही विकल्प यह है कि बूढ़ा बूढ़ा होने के कारण और बालक छोटा हेने के कारण दोनों गधे पर बैठे। पर घर जाने के लिए रुककर विश्राम का अन्तराल भी रखे। गधे के स्थान पर तुम्हारे पास चल संसाधन हैं। साइकिल, स्कूटर, मोटर-साइकिल, कार, बस आदि सब गधे के संसाधन तुल्य हैं। दुनियां की परवाह न करते इन संसाधनों का श्रेष्ठ उपयोग ही करो।
6)    पूरा इतिहास गवाह है समाज नवाचार का भरपूर विरोध करता है। सुकरात, ब्रूनो, एनेक्सगोरस, गैलीलिओ, स्पिनोजा, कुमारिल भट, दयानन्द, हाब्स आदि के नवाचारों तथा नव विचारों पर समाज ने घातक-पातक व्यवहार किया। राजातन्त्र में तो फिर भी नवाचार तो कभी कदा प्रश्रय पाता था। लेकिन प्रजातन्त्र में जहां राजा भी औसत प्रजा तथा घटिया प्रजा ही चुनती है वहां नव विचारों की भ्रूण हत्या औसत द्वारा सरे आम की जाती है।
7)    प्रजातन्त्री जगत में एक गधे से गधे व्यक्ति को भी विचार, विश्वास, उपासना, अभिव्यक्ति की उतनी ही आजादी है जितनी कि विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति को। गधे से गधा व्यक्ति विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति के विचारों पर थूक दे सकता है और भावनाओं के चोट के अन्तर्गत उस पर मुकदमा भी चला सकता है। याद रखो यहां विद्वत्ता पथ पर चलने में बाधाएं ही बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा प्रजातन्त्र है।
8)    सुखी सुसंस्कृत समाज के सदस्य बनने से व्यक्ति भी सुखी सुसंस्कृत होता है। दुःखी असंस्कृत समाज का सदस्य होने से व्यक्ति भी दुःखी असंस्कृत होता है।
9)    दुःखियों का दुःख दूर करने में सहयोग करने से दुहरी प्रसन्नता का भान होता है। जिसका दुःख दूर हुआ है वह व्यक्ति भी तुम्हें सुखकर होता है। वह भी और तुम स्वयं भी सुखकर होते हो।
10)    प्रेम व्यवहार, सच बोलना, बिना इजाजत अपनों की वस्तु भी न लेना, पुरुष द्वारा नारी समाज और नारी द्वारा पुरुष समाज का आदर करना, दूसरों का आत्मवत आदर ये पांच वे निर्बाध व्यवहार हैं जिनका आचरण हमेशा सबका हित करनेवाला है। इन पांचों व्यवहारों से समाज जुड़ा हुआ है। अतः व्यक्ति निर्बाध होने पर भी ये समाज बाध हैं।
11)    अपनी तथा आस-पास की सफाई, अपनी कमाई पर सन्तोष, अपने सुख भोगना तथा अपने दुःख सहना, पढ़ना-समझना-आचरना और साधना करना हर मानव के व्यक्तिगत क्षेत्र हैं। ये समाज बाध नहीं हैं। इनका पालन आजादीपूर्वक किया जा सकता है।
12)    संसार में एक अरब लोग भूख से पीड़ित हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि संसार के बाकी पांच अरब लोग बेपीर हैं। पीर वह है जो पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करता है।
13)    हर आदमी अगर पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करनेवाला पीर हो जाए तो सारे अनाथाश्राम, विधवाश्रम, वृद्धाश्रम, बालाश्रम समाप्त हो जाएंगे।
14)    यदि तुम डॉक्टर हो, वकील हो, शिक्षक हो, सलाहकार हो, इंजीनियर हो तो चलते-फिरते यह सब हो जाओ। तुम चलते-फिरते डॉक्टर हो जाओ, चलते-फिरते वकील आदि-आदि हो जाओ। इससे तुम्हारा जीवन स्वर्ग हो जाएगा और समाज भी सुखी हो जाएगा। ‘भापा’ चलता-फिरता उपरोक्त सभी कुछ है।
ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

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