Tuesday, November 23, 2010

“उल्लूपन सवार ये संसार”

    उल्लू सवार को लक्ष्मी कहते हैं। उल्लूपन सवार को लक्ष्मीपति कहते हैं। प्रजातन्त्री लक्ष्मीपति अरब-खरबपति होते हैं। प्रजातन्त्र में तीन तरह के अरबपति-खरबपति आम मिलते हैं। प्रथम श्रेणी के खरबपति फिल्मी, द्वितीय श्रेणी के खेल्ली, तृतीय श्रेणी के प्रजाल्ली होते हैं। प्रथम श्रेणी को अभिनेता-अभिनेत्री या एक्टर-एक्ट्रेस, द्वितीय श्रेणी को किरकेटी-टेनिसी और तृतीय श्रेणी को नेता-नेत्री या प्रजानन-प्रजाननी कहते हैं। प्रजातन्त्री संसदें आजकल इन तीनों की तिकड़ी महाविकटी होती चली जा रही है। तीनों तरह के अरब-खरबपति उल्लूपनों पर सवार रहते हैं। जो जितना अध्ािक उल्लूपनों पर सवार रहता है वह उतना बड़ा अरबपति या खरबपति होता है।
    हम प्रथम फिल्मी श्रेणी के सर्वोच्च स्तर से शुरु करें। ये मोम पुतले संघनीकृत लंदनी अमर हैं। कलकतिया लोगों ने इनकी मूर्ति गढ़ मन्दिर सजा इन्हें भगवान मान लिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक उल्लू सर्वेक्षण के आधार पर इनके भविष्य में भारत के महामहिम राष्ट्रपति होने की संभावना है। प्रजातन्त्र में हर गप के सच होने की संभावना होती हैे। चौधरी चरणसिंह के जमाने का नेहरु जय, इन्दिरा जय, संजय-राजीव जय, उनके बेटे-बेटी जय का उस समय का महामजाक सारे सचों का करके कलेजाचाक आज दिखा रहा है नंगा नाच कि प्रजातन्त्र का कहीं कोई भी नहीं है माईबाप। लोगों का सच औसतः रोगी होता है। उच्चतम श्रेणी अभिनेता को भोग के कारण रोग हुआ। पेट रोग का इलाज दिल अस्पताल से न मिला। अंततः दक्ष प्रशिक्षित पेट डॉक्टरों ने कौशलपूर्वक सफल इलाज किया और श्रेय तिरुपति नौ करोड़ के ब्रेसलेट के साथ ले गया। तिरुपति भगवान के बाप-दादाओं ने कभी ब्रेसलेट शब्द भी न सुना था। हजारों मूर्ख मुहूर्त-तिथि-वार-अंक मान्यताओं से फिल्म-फिल्म गुजरकर बेटे की शादी दहलीज पर ये आ पहुंचे। द्वि प्यार द्वार अटक-भटक वधू के मंगली होने पर प्रथम अस्वीकार बाद ये अंधविश्वास के चरम द्वार पहुंचे। मंगल दोष उपचार हजार कलाकार द्वय परिवार अरबपति तथा उनके खरबपति प्रजानन सांसद पार सब करते महा स्वीकार। आक्ख भारत गवाह-गवाह संसार 1. अन्दिरों-मन्दिरों भटकना, 2. अत्न-रत्न धारण, 3. उंभ-कुम्भ विवाह, 4. उत्तर भारत पीपल-पेड़ से वधू विवाह, 5. दक्षिण भारत मंदिर गाछ से विवाह, 6. अयोध्या में जड़ मूर्ति से विवाह और संभवतः 7. हनुमान के बांए पैर सरसौं तेल चढ़ाना, 8. हनुमान चालीसा पढ़ना और 9. गणेश मन्त्र पढ़ना। इतना उल्लूपन करना। उल्लूपन के महासागरों में सबका डूब मरना और फिर विश्व प्रसिद्ध विवाह करना। यह तो एक परिवार की अंधी व्यथा-कथा है। यहां तो हर फिल्मी हस्ती छोटी-बड़ी उल्लूपन अन्धविश्वासी मुहूर्तों-नम्बरों सनी है। नायकों की ड्रेस, नायकों के पिटने के दृष्य, नायक चयन, कहानी के ठूंस तत्व, फिल्म नाम आदि-आदि अन्धविश्वासों की भरमार है। जहां जितना उल्लूपन है वहां उतनी मनी-मनी, उतनी सफलता है।
    अब किरकेटी दुनियां की बात करें तो विश्वकप जीती टीम में सर्वश्रेष्ठ होने का पुरस्कार जीता व्यक्ति लाल रुमाल गुलाम था। एक महादादा खिलाड़ी महापैसेबाज धनराज ज्योतिषी बताए नम्बरों को कमीज़ पर विशेषतः डलवाता था। इस विश्वकप की टीम के पिद्दीपन का राज हर खिलाड़ी द्वारा भीतर ज्योतिषी द्वारा बताया जीत नंबर ‘नौ’ पहनना था। नौ का फेर टीम को ले डूबा। हर पचासी-सौव्वी बनाने पर, चौका-छक्का मारने पर कोई मुंह उठा सूरज देखता है, कोई तावीज़ छूता है, कोई क्रॉस खींचता है, कोई लॉकेट चूमता है, कोई शायद जेब रखा जड़ देवता छूता है। जहां इतने अन्धविश्वास टुकड़े-टुकड़े अपने-अपने उल्लूपन खेलते हों वहां टीम का अलनटप्पू होना अर्थात् कभी भी जीतना कभी भी हारना तय है। और हर चुनौति का मौका आने पर ढह जाना स्वाभाविक है। इतने उल्लूपनों पर लक्ष्मी का तो न्योछावर होना ही था। मेरा छोटा बेटा भी अंशतः किरकेटी है। उसने भी कुछ दिन गले में ताविज़ जड़ मूर्ति धारण की। बुरा हो मेरी बीबी का उसने जबरन उसे उतरवा दिया। उसके अरबपति-खरबपति होने का चांस ही खतम हो गया। दोष किरकेटी खिलाड़ियों का नहीं किरकेटी खेल है जो स्वयं अलनटप्पू है। करेला और नीम चढ़ा- भारतीय क्रिकेट टीम शराब डूबी भी है। दूधो-पूतो फलने की कहावत यहां शराबों-अरबों फलों रूप में सार्थक है। हर जीत हर हार यहां शराब का नंगा नाच नही अपितु नंगा स्नान भी होता है। इन्होने कोच का कहना भी न माना कि शैम्पेन पीने की चीज़ होती है नहाने की नहीं, और पूर्ववत शैम्पेन नहाते-फलते रहे। एक कहावत है- मैच के दो घंटे पहले टीम शराब पी रही थी। किसी ने पूछ लिया- ”इस समय शराब ?“ राजबाग ने कहा- ”बताओ हम जीतेंगे तो क्या करेंगे ?“ व्यक्ति बोला- ”शराब पी खुशियां मनाएंगे।“ राजबाग बोला- ”और हार जाएंगे तो क्या करेंगे ?“ व्यक्ति बोला- ”शराब पी गम गलत करेंगे।“ राजबाग ने कहा- ”जब हर हाल पीना है तो हम अभी ही क्यों न पीएं ? इसलिए पी रहे हैं।“ काश कोई कोच समझ सोच पूर्वक भारतीय क्रिकेट टीम को भाग्यवाद और शराब के चंगुल से बचा पाए तो भारतीय टीम हर विश्वकप जीत जाए।
    तृतीय खरबपति वर्ग है प्रजाननी। प्रजा हमेशा औसती होती है। औसती प्रजा आखिर है क्या ? जड़ पूजती, वृक्ष पूजती, गंडे-ताविजी, जय-सन्तोषी व्रती, तिरुपतियाई, साई-भाई, भगोड़ों को पूजती, गायत्री को मूर्खता बना अर्चती, चौथे-सातवें बिन्दु भगवानों को पूजती, अंध रामाई, अंध कृष्णाई, मैय्याई और लमलेट जिसकी बुद्धि जड़ ठेठ। और ऐसी प्रजा का आनन लगा लेनेवाला प्रजानन भी जड़त्व बुद्धि भरा मुहूर्ती, पूजाई, मंदिराई, मसजिदाई, गिरजाई, सब एक साथ नपुसक धर्माई आदि-आदि सर्व उल्लूपन सवार खरबपति होता है।
    यह त्रयी, तीन टिकटी महा विकटी, कहीं भव्य बाराती हो विदेशी मद्य प्याली, अजरारे-कजरारे नाचते-झूमते आवेग जाते मिडियाई प्रोपेगेंडा सवार बेड़ा पार धन अतिरिक्त सर्व बंठाधार होता है। यह त्रयी इसी स्थिति नाम रूप बदल विश्व अर्थ सम्मेलन, विश्व शान्ति सम्मेलन, विश्व उद्योग सम्मेलन, सर्वजन प्रिय कजरारे आदि गाते बहकते-बहकते विश्व प्रतिस्पर्धा में भारत के प्रथम ठहराते लगाता ठहाके अरबपति से आगे जाते नहीं अघाता है। मीडिया भौपूओंवत इनका डंका बजाते इन्हें छापते-आपते और इन्हीं के इर्द-गिर्द बिन बुलाए मेहमान उर्फ मक्खीवत झूमते-झामते इनका राग गा, इनके आधार टुकड़े कमा खूब धन मोटाता है।
    बे-लय-ताल, पूर्ण असार, यह उल्लूपन सवार संसार... हंसने की चीज़ है यार ! हंसो.. हंसो... हंसो.... त्रि-बार और बार-बार !!
ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

Tuesday, November 2, 2010

“जगत और मानव”

1)    जगत मानव समूह है। मानव अकेला है। जगत सदायी है। मानव अस्थाई है। जगत श्रेष्ठ नहीं हो सकता। मानव श्रेष्ठ हो सकता है। जगत को श्रेठ होने में लम्बा समय लगता है। जगत को पतित होने में भी समय लगता है। मानव के पतित होने में कम समय लगता है।
2)    समाज के तीन घटक होते हैं। एक श्रेष्ठ, दो औसत, तीन घटिया। इसमें घटिया करीब़-करीब़ चालीस प्रतिशत, औसत करीब़ पचास प्रतिशत और श्रेष्ठ करीब़ दस प्रतिशत होते हैं।
3)    याद रखो तुम श्रेष्ठ घटक में शामिल हो। तुम्हें जीवन में औसत घटक और घटिया घटक की अनचाही बातें सुननी पड़ सकती हैं।
4)    बूढ़े, बालक और गधे की कथा तुमने पढ़ रखी है। बूढ़े एवं बालक को जनता के औसत और घटिया समूह ने अन्त में गधे को ढोकर ले जाने के लिए बाध्य कर दिया था। याद रखो बूढे के गधे पर बैठने पर उसे “कैसा निर्दयी” कहा। बच्चे के गधे पर बैठने से उसे ‘स्वार्थी’ कहा। और दोनों के गधे पर बैठने से उन्हें “दया-ममता से रहित” कहा था। यह सुन दानों ने गधे को जब उठाकर चलने लगे तो इसी जनता ने उनकी ‘गधा’ कहकर हंसी उड़ाई थी। औसत दुनियां + घटिया दुनियां के राज्य को प्रजातन्त्र कहते हैं। दुनियां के अनुसार चलोगे तो गधे ठहरोगे।
5)    उपरोक्त कथा में सही विकल्प यह है कि बूढ़ा बूढ़ा होने के कारण और बालक छोटा हेने के कारण दोनों गधे पर बैठे। पर घर जाने के लिए रुककर विश्राम का अन्तराल भी रखे। गधे के स्थान पर तुम्हारे पास चल संसाधन हैं। साइकिल, स्कूटर, मोटर-साइकिल, कार, बस आदि सब गधे के संसाधन तुल्य हैं। दुनियां की परवाह न करते इन संसाधनों का श्रेष्ठ उपयोग ही करो।
6)    पूरा इतिहास गवाह है समाज नवाचार का भरपूर विरोध करता है। सुकरात, ब्रूनो, एनेक्सगोरस, गैलीलिओ, स्पिनोजा, कुमारिल भट, दयानन्द, हाब्स आदि के नवाचारों तथा नव विचारों पर समाज ने घातक-पातक व्यवहार किया। राजातन्त्र में तो फिर भी नवाचार तो कभी कदा प्रश्रय पाता था। लेकिन प्रजातन्त्र में जहां राजा भी औसत प्रजा तथा घटिया प्रजा ही चुनती है वहां नव विचारों की भ्रूण हत्या औसत द्वारा सरे आम की जाती है।
7)    प्रजातन्त्री जगत में एक गधे से गधे व्यक्ति को भी विचार, विश्वास, उपासना, अभिव्यक्ति की उतनी ही आजादी है जितनी कि विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति को। गधे से गधा व्यक्ति विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति के विचारों पर थूक दे सकता है और भावनाओं के चोट के अन्तर्गत उस पर मुकदमा भी चला सकता है। याद रखो यहां विद्वत्ता पथ पर चलने में बाधाएं ही बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा प्रजातन्त्र है।
8)    सुखी सुसंस्कृत समाज के सदस्य बनने से व्यक्ति भी सुखी सुसंस्कृत होता है। दुःखी असंस्कृत समाज का सदस्य होने से व्यक्ति भी दुःखी असंस्कृत होता है।
9)    दुःखियों का दुःख दूर करने में सहयोग करने से दुहरी प्रसन्नता का भान होता है। जिसका दुःख दूर हुआ है वह व्यक्ति भी तुम्हें सुखकर होता है। वह भी और तुम स्वयं भी सुखकर होते हो।
10)    प्रेम व्यवहार, सच बोलना, बिना इजाजत अपनों की वस्तु भी न लेना, पुरुष द्वारा नारी समाज और नारी द्वारा पुरुष समाज का आदर करना, दूसरों का आत्मवत आदर ये पांच वे निर्बाध व्यवहार हैं जिनका आचरण हमेशा सबका हित करनेवाला है। इन पांचों व्यवहारों से समाज जुड़ा हुआ है। अतः व्यक्ति निर्बाध होने पर भी ये समाज बाध हैं।
11)    अपनी तथा आस-पास की सफाई, अपनी कमाई पर सन्तोष, अपने सुख भोगना तथा अपने दुःख सहना, पढ़ना-समझना-आचरना और साधना करना हर मानव के व्यक्तिगत क्षेत्र हैं। ये समाज बाध नहीं हैं। इनका पालन आजादीपूर्वक किया जा सकता है।
12)    संसार में एक अरब लोग भूख से पीड़ित हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि संसार के बाकी पांच अरब लोग बेपीर हैं। पीर वह है जो पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करता है।
13)    हर आदमी अगर पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करनेवाला पीर हो जाए तो सारे अनाथाश्राम, विधवाश्रम, वृद्धाश्रम, बालाश्रम समाप्त हो जाएंगे।
14)    यदि तुम डॉक्टर हो, वकील हो, शिक्षक हो, सलाहकार हो, इंजीनियर हो तो चलते-फिरते यह सब हो जाओ। तुम चलते-फिरते डॉक्टर हो जाओ, चलते-फिरते वकील आदि-आदि हो जाओ। इससे तुम्हारा जीवन स्वर्ग हो जाएगा और समाज भी सुखी हो जाएगा। ‘भापा’ चलता-फिरता उपरोक्त सभी कुछ है।
ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

Thursday, September 30, 2010

"अज्ञानबघारू है प्रजानन"

      अज्ञानबघारू है प्रजानन। न जानने पर भी उस विषय में धडल्ले से बकनेवाले को अज्ञान बघारू कहते हैं। इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, वकीलीशैक्षिकी, वैज्ञानिकी, ज्ञानशून्य एवं अत्यल्पज्ञ होने पर भी इनके सम्मेलनों में आनतान रटे रटाए भाषण देने वाला व्यक्ति प्रजानन अज्ञानबघारू होता है। बघार कहते हैं संस्कार करने को। अज्ञान संस्कार रोपने वाले को अज्ञानबघारू कहते हैं।
            न भाजपा, न राजद, न कांग्रेस, न कम्युनिस्ट, न स.पा. आदि के किसी भी प्रजानन को वैज्ञानिक विधि की समझ है। वैज्ञानिक विधि विज्ञान की आत्मा है। पर सारे प्रजानन संस्कृतिकरण, भगवाकरण पर बिना समझे पक्ष विपक्ष में हजारों वक्तव्य अज्ञानबघारू हैं। इन्हें यह नहीं मालूम कि भारतीय संस्कृति की हर पुस्तक (नाटक काव्य भी) वैज्ञानिक विधि के प्रकृष्ट प्रयोग द्वारा ही लिखी गई है। अतः वैज्ञानिक ही है।

“अनात्म व्यवहारू, आत्म-हत्यारू है प्रजानन”

     अनात्म व्यवहारू है प्रजानन। प्रजानन सर्वाधिक अनात्मा या आत्महना होता है। आत्मवत व्यवहार सारे धर्मों की आत्मा है। आत्मवत व्यवहार का सार यह है कि- करो वह ही व्यवहार दूसरे के साथ जो उस परिस्थिति तुम चाहते हो कि दूसरे करें तुम्हारे साथ नकारात्मक सूत्र रूप में मत करो वह व्यवहार दूसरे के साथ जो तुम नहीं चाहते कोई दूसरा करे तुम्हारे साथ 
        एक गर्भवती प्रसूता निकट महिला, एक परीक्षा देने जाता छात्र, एक अस्पताल जाता मरीज, अत्यावश्यक कार्य पर जाता मनुष्य तो मनुष्य सड़क पर नियमबद्ध अपने रास्ते जाता आम आदमी भी कभी नहीं चाहता कि अचानक अकारण उसे रोक दिया जाए। पर प्रजानन वह जीव है जो उपरोक्त सबको अपनी सुरक्षा के बहाने रुकवा देता है। घोर आत्महना है प्रजानन, आत्म-हत्यारू प्रजानन।

"परिवारतारू प्रजानन"

      परिवारतारू होता है प्रजानन। डॉक्टर की बीबी डॉक्टरनी, मास्टर की बीबी मास्टरीन, वकील की बीबी वकीलन, गौटिया की बीबी गौटियन होती है। चाहे वह ठेठ अनपढ़ ही क्यों न हो पर बिना योग्यता डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, मास्टर का बेटा मास्टर, वकील का बेटा वकील, गौटिया का बेटा गौटिया नहीं होता है| पर नेता का बेटे का बेटा भी प्रायः नेता होता है। 
     सच्चा नेता परिवारतारू होता है। प्रजानन दशानन से घातक है। दशानन का कोई बेटा दशानन नहीं था, कोई वंज भी दशानन नहीं था। प्रजातन्त्र में मध्यप्रदे के प्रजानन का ज्वलन्त उदाहरण है। हरियाणा राजस्थान बिहार आदि केन्द्र में भी पलड़ा प्रजानन के प्रजानन का ही भारी रहा है। धृतराष्ट्र से कहावत प्रसिद्ध है- अन्धे के अन्धे ही होते हैं  
     प्रजातन्त्र में प्रजानन प्रायः परिवारतारू होता है। शादीशुदा तो शादीशुदा कुंवारे पर भी प्रजानन के प्रजानन नियम लागू होता है।

Monday, September 27, 2010

"सुरक्षा व्यवस्था और प्रजातन्त्र"

    व्यक्ति आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह अपनी शक्ति के कारण रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। 
    आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस से चालीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।  
    आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों में, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है।

"दशानन-प्रजानन-प्रजातन्त्र"

दशानन कहते हैं रावण को जिसमें बताया जाता है कि दस श्रेष्ठ व्यक्तियों का ज्ञान समाहित था। किन्तु परस्त्री भोगेच्छा के कारण अपने समस्त राक्षस कुल एवं राष्ट्र के लिए घातक-पातक था। नौ लाख वर्षों पूर्व के एक गधा सिर रावण को अपनी भूलों के लिए आज तक भी जलाया जाता आ रहा है। आज प्रजातन्त्र में प्रजाननों का बोलबाला है। येन केन प्रकारेण प्रजा के मतों से जीता लाखों गधासिरों से बना है सिर जिसका और इन गधा सिरों पर एक महाधूर्त सियार सिर सिरमौर है जिसका ऐसा दषानन से कहीं घातक, कहीं पातक एम.एल.ए., एम.पी., उपमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री,  प्रधानमन्त्री नामधारी व्यक्ति प्रजानन है। संक्षेप में प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें। प्रजाननों के अधिकार में दस नहीं अनेक आनन हैं। प्रधानमन्त्री ऊंगली की नोक पर मन्त्री बदल सकता है, सचिव बदल सकता है, दशानन के आनन नियत थे। प्रजानन के आनन परिवर्तनशील हैं। हां प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी भी बदल सकता है, अपना आनन भी बदल सकता है। दशानन से कितना खतरनाक, भयानक है प्रजातन्त्र की उपज प्रजानन। अमेरिकी राष्ट्रपति महान प्रजानन के पास कोड शब्द हैं। जिन्हें दबाते ही दनदनाते परमाणु अस्त्र पूरे विश्व को काला कर दे सकते हैं, भून दे सकते हैं। सारी दुनियां को एक बार नहीं कई-कई बार मानव जाति से रहित किया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह सम्भव है।