Tuesday, November 23, 2010

“उल्लूपन सवार ये संसार”

    उल्लू सवार को लक्ष्मी कहते हैं। उल्लूपन सवार को लक्ष्मीपति कहते हैं। प्रजातन्त्री लक्ष्मीपति अरब-खरबपति होते हैं। प्रजातन्त्र में तीन तरह के अरबपति-खरबपति आम मिलते हैं। प्रथम श्रेणी के खरबपति फिल्मी, द्वितीय श्रेणी के खेल्ली, तृतीय श्रेणी के प्रजाल्ली होते हैं। प्रथम श्रेणी को अभिनेता-अभिनेत्री या एक्टर-एक्ट्रेस, द्वितीय श्रेणी को किरकेटी-टेनिसी और तृतीय श्रेणी को नेता-नेत्री या प्रजानन-प्रजाननी कहते हैं। प्रजातन्त्री संसदें आजकल इन तीनों की तिकड़ी महाविकटी होती चली जा रही है। तीनों तरह के अरब-खरबपति उल्लूपनों पर सवार रहते हैं। जो जितना अध्ािक उल्लूपनों पर सवार रहता है वह उतना बड़ा अरबपति या खरबपति होता है।
    हम प्रथम फिल्मी श्रेणी के सर्वोच्च स्तर से शुरु करें। ये मोम पुतले संघनीकृत लंदनी अमर हैं। कलकतिया लोगों ने इनकी मूर्ति गढ़ मन्दिर सजा इन्हें भगवान मान लिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक उल्लू सर्वेक्षण के आधार पर इनके भविष्य में भारत के महामहिम राष्ट्रपति होने की संभावना है। प्रजातन्त्र में हर गप के सच होने की संभावना होती हैे। चौधरी चरणसिंह के जमाने का नेहरु जय, इन्दिरा जय, संजय-राजीव जय, उनके बेटे-बेटी जय का उस समय का महामजाक सारे सचों का करके कलेजाचाक आज दिखा रहा है नंगा नाच कि प्रजातन्त्र का कहीं कोई भी नहीं है माईबाप। लोगों का सच औसतः रोगी होता है। उच्चतम श्रेणी अभिनेता को भोग के कारण रोग हुआ। पेट रोग का इलाज दिल अस्पताल से न मिला। अंततः दक्ष प्रशिक्षित पेट डॉक्टरों ने कौशलपूर्वक सफल इलाज किया और श्रेय तिरुपति नौ करोड़ के ब्रेसलेट के साथ ले गया। तिरुपति भगवान के बाप-दादाओं ने कभी ब्रेसलेट शब्द भी न सुना था। हजारों मूर्ख मुहूर्त-तिथि-वार-अंक मान्यताओं से फिल्म-फिल्म गुजरकर बेटे की शादी दहलीज पर ये आ पहुंचे। द्वि प्यार द्वार अटक-भटक वधू के मंगली होने पर प्रथम अस्वीकार बाद ये अंधविश्वास के चरम द्वार पहुंचे। मंगल दोष उपचार हजार कलाकार द्वय परिवार अरबपति तथा उनके खरबपति प्रजानन सांसद पार सब करते महा स्वीकार। आक्ख भारत गवाह-गवाह संसार 1. अन्दिरों-मन्दिरों भटकना, 2. अत्न-रत्न धारण, 3. उंभ-कुम्भ विवाह, 4. उत्तर भारत पीपल-पेड़ से वधू विवाह, 5. दक्षिण भारत मंदिर गाछ से विवाह, 6. अयोध्या में जड़ मूर्ति से विवाह और संभवतः 7. हनुमान के बांए पैर सरसौं तेल चढ़ाना, 8. हनुमान चालीसा पढ़ना और 9. गणेश मन्त्र पढ़ना। इतना उल्लूपन करना। उल्लूपन के महासागरों में सबका डूब मरना और फिर विश्व प्रसिद्ध विवाह करना। यह तो एक परिवार की अंधी व्यथा-कथा है। यहां तो हर फिल्मी हस्ती छोटी-बड़ी उल्लूपन अन्धविश्वासी मुहूर्तों-नम्बरों सनी है। नायकों की ड्रेस, नायकों के पिटने के दृष्य, नायक चयन, कहानी के ठूंस तत्व, फिल्म नाम आदि-आदि अन्धविश्वासों की भरमार है। जहां जितना उल्लूपन है वहां उतनी मनी-मनी, उतनी सफलता है।
    अब किरकेटी दुनियां की बात करें तो विश्वकप जीती टीम में सर्वश्रेष्ठ होने का पुरस्कार जीता व्यक्ति लाल रुमाल गुलाम था। एक महादादा खिलाड़ी महापैसेबाज धनराज ज्योतिषी बताए नम्बरों को कमीज़ पर विशेषतः डलवाता था। इस विश्वकप की टीम के पिद्दीपन का राज हर खिलाड़ी द्वारा भीतर ज्योतिषी द्वारा बताया जीत नंबर ‘नौ’ पहनना था। नौ का फेर टीम को ले डूबा। हर पचासी-सौव्वी बनाने पर, चौका-छक्का मारने पर कोई मुंह उठा सूरज देखता है, कोई तावीज़ छूता है, कोई क्रॉस खींचता है, कोई लॉकेट चूमता है, कोई शायद जेब रखा जड़ देवता छूता है। जहां इतने अन्धविश्वास टुकड़े-टुकड़े अपने-अपने उल्लूपन खेलते हों वहां टीम का अलनटप्पू होना अर्थात् कभी भी जीतना कभी भी हारना तय है। और हर चुनौति का मौका आने पर ढह जाना स्वाभाविक है। इतने उल्लूपनों पर लक्ष्मी का तो न्योछावर होना ही था। मेरा छोटा बेटा भी अंशतः किरकेटी है। उसने भी कुछ दिन गले में ताविज़ जड़ मूर्ति धारण की। बुरा हो मेरी बीबी का उसने जबरन उसे उतरवा दिया। उसके अरबपति-खरबपति होने का चांस ही खतम हो गया। दोष किरकेटी खिलाड़ियों का नहीं किरकेटी खेल है जो स्वयं अलनटप्पू है। करेला और नीम चढ़ा- भारतीय क्रिकेट टीम शराब डूबी भी है। दूधो-पूतो फलने की कहावत यहां शराबों-अरबों फलों रूप में सार्थक है। हर जीत हर हार यहां शराब का नंगा नाच नही अपितु नंगा स्नान भी होता है। इन्होने कोच का कहना भी न माना कि शैम्पेन पीने की चीज़ होती है नहाने की नहीं, और पूर्ववत शैम्पेन नहाते-फलते रहे। एक कहावत है- मैच के दो घंटे पहले टीम शराब पी रही थी। किसी ने पूछ लिया- ”इस समय शराब ?“ राजबाग ने कहा- ”बताओ हम जीतेंगे तो क्या करेंगे ?“ व्यक्ति बोला- ”शराब पी खुशियां मनाएंगे।“ राजबाग बोला- ”और हार जाएंगे तो क्या करेंगे ?“ व्यक्ति बोला- ”शराब पी गम गलत करेंगे।“ राजबाग ने कहा- ”जब हर हाल पीना है तो हम अभी ही क्यों न पीएं ? इसलिए पी रहे हैं।“ काश कोई कोच समझ सोच पूर्वक भारतीय क्रिकेट टीम को भाग्यवाद और शराब के चंगुल से बचा पाए तो भारतीय टीम हर विश्वकप जीत जाए।
    तृतीय खरबपति वर्ग है प्रजाननी। प्रजा हमेशा औसती होती है। औसती प्रजा आखिर है क्या ? जड़ पूजती, वृक्ष पूजती, गंडे-ताविजी, जय-सन्तोषी व्रती, तिरुपतियाई, साई-भाई, भगोड़ों को पूजती, गायत्री को मूर्खता बना अर्चती, चौथे-सातवें बिन्दु भगवानों को पूजती, अंध रामाई, अंध कृष्णाई, मैय्याई और लमलेट जिसकी बुद्धि जड़ ठेठ। और ऐसी प्रजा का आनन लगा लेनेवाला प्रजानन भी जड़त्व बुद्धि भरा मुहूर्ती, पूजाई, मंदिराई, मसजिदाई, गिरजाई, सब एक साथ नपुसक धर्माई आदि-आदि सर्व उल्लूपन सवार खरबपति होता है।
    यह त्रयी, तीन टिकटी महा विकटी, कहीं भव्य बाराती हो विदेशी मद्य प्याली, अजरारे-कजरारे नाचते-झूमते आवेग जाते मिडियाई प्रोपेगेंडा सवार बेड़ा पार धन अतिरिक्त सर्व बंठाधार होता है। यह त्रयी इसी स्थिति नाम रूप बदल विश्व अर्थ सम्मेलन, विश्व शान्ति सम्मेलन, विश्व उद्योग सम्मेलन, सर्वजन प्रिय कजरारे आदि गाते बहकते-बहकते विश्व प्रतिस्पर्धा में भारत के प्रथम ठहराते लगाता ठहाके अरबपति से आगे जाते नहीं अघाता है। मीडिया भौपूओंवत इनका डंका बजाते इन्हें छापते-आपते और इन्हीं के इर्द-गिर्द बिन बुलाए मेहमान उर्फ मक्खीवत झूमते-झामते इनका राग गा, इनके आधार टुकड़े कमा खूब धन मोटाता है।
    बे-लय-ताल, पूर्ण असार, यह उल्लूपन सवार संसार... हंसने की चीज़ है यार ! हंसो.. हंसो... हंसो.... त्रि-बार और बार-बार !!
ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

Tuesday, November 2, 2010

“जगत और मानव”

1)    जगत मानव समूह है। मानव अकेला है। जगत सदायी है। मानव अस्थाई है। जगत श्रेष्ठ नहीं हो सकता। मानव श्रेष्ठ हो सकता है। जगत को श्रेठ होने में लम्बा समय लगता है। जगत को पतित होने में भी समय लगता है। मानव के पतित होने में कम समय लगता है।
2)    समाज के तीन घटक होते हैं। एक श्रेष्ठ, दो औसत, तीन घटिया। इसमें घटिया करीब़-करीब़ चालीस प्रतिशत, औसत करीब़ पचास प्रतिशत और श्रेष्ठ करीब़ दस प्रतिशत होते हैं।
3)    याद रखो तुम श्रेष्ठ घटक में शामिल हो। तुम्हें जीवन में औसत घटक और घटिया घटक की अनचाही बातें सुननी पड़ सकती हैं।
4)    बूढ़े, बालक और गधे की कथा तुमने पढ़ रखी है। बूढ़े एवं बालक को जनता के औसत और घटिया समूह ने अन्त में गधे को ढोकर ले जाने के लिए बाध्य कर दिया था। याद रखो बूढे के गधे पर बैठने पर उसे “कैसा निर्दयी” कहा। बच्चे के गधे पर बैठने से उसे ‘स्वार्थी’ कहा। और दोनों के गधे पर बैठने से उन्हें “दया-ममता से रहित” कहा था। यह सुन दानों ने गधे को जब उठाकर चलने लगे तो इसी जनता ने उनकी ‘गधा’ कहकर हंसी उड़ाई थी। औसत दुनियां + घटिया दुनियां के राज्य को प्रजातन्त्र कहते हैं। दुनियां के अनुसार चलोगे तो गधे ठहरोगे।
5)    उपरोक्त कथा में सही विकल्प यह है कि बूढ़ा बूढ़ा होने के कारण और बालक छोटा हेने के कारण दोनों गधे पर बैठे। पर घर जाने के लिए रुककर विश्राम का अन्तराल भी रखे। गधे के स्थान पर तुम्हारे पास चल संसाधन हैं। साइकिल, स्कूटर, मोटर-साइकिल, कार, बस आदि सब गधे के संसाधन तुल्य हैं। दुनियां की परवाह न करते इन संसाधनों का श्रेष्ठ उपयोग ही करो।
6)    पूरा इतिहास गवाह है समाज नवाचार का भरपूर विरोध करता है। सुकरात, ब्रूनो, एनेक्सगोरस, गैलीलिओ, स्पिनोजा, कुमारिल भट, दयानन्द, हाब्स आदि के नवाचारों तथा नव विचारों पर समाज ने घातक-पातक व्यवहार किया। राजातन्त्र में तो फिर भी नवाचार तो कभी कदा प्रश्रय पाता था। लेकिन प्रजातन्त्र में जहां राजा भी औसत प्रजा तथा घटिया प्रजा ही चुनती है वहां नव विचारों की भ्रूण हत्या औसत द्वारा सरे आम की जाती है।
7)    प्रजातन्त्री जगत में एक गधे से गधे व्यक्ति को भी विचार, विश्वास, उपासना, अभिव्यक्ति की उतनी ही आजादी है जितनी कि विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति को। गधे से गधा व्यक्ति विद्वान् से विद्वान् व्यक्ति के विचारों पर थूक दे सकता है और भावनाओं के चोट के अन्तर्गत उस पर मुकदमा भी चला सकता है। याद रखो यहां विद्वत्ता पथ पर चलने में बाधाएं ही बाधाएं हैं। सबसे बड़ी बाधा प्रजातन्त्र है।
8)    सुखी सुसंस्कृत समाज के सदस्य बनने से व्यक्ति भी सुखी सुसंस्कृत होता है। दुःखी असंस्कृत समाज का सदस्य होने से व्यक्ति भी दुःखी असंस्कृत होता है।
9)    दुःखियों का दुःख दूर करने में सहयोग करने से दुहरी प्रसन्नता का भान होता है। जिसका दुःख दूर हुआ है वह व्यक्ति भी तुम्हें सुखकर होता है। वह भी और तुम स्वयं भी सुखकर होते हो।
10)    प्रेम व्यवहार, सच बोलना, बिना इजाजत अपनों की वस्तु भी न लेना, पुरुष द्वारा नारी समाज और नारी द्वारा पुरुष समाज का आदर करना, दूसरों का आत्मवत आदर ये पांच वे निर्बाध व्यवहार हैं जिनका आचरण हमेशा सबका हित करनेवाला है। इन पांचों व्यवहारों से समाज जुड़ा हुआ है। अतः व्यक्ति निर्बाध होने पर भी ये समाज बाध हैं।
11)    अपनी तथा आस-पास की सफाई, अपनी कमाई पर सन्तोष, अपने सुख भोगना तथा अपने दुःख सहना, पढ़ना-समझना-आचरना और साधना करना हर मानव के व्यक्तिगत क्षेत्र हैं। ये समाज बाध नहीं हैं। इनका पालन आजादीपूर्वक किया जा सकता है।
12)    संसार में एक अरब लोग भूख से पीड़ित हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि संसार के बाकी पांच अरब लोग बेपीर हैं। पीर वह है जो पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करता है।
13)    हर आदमी अगर पराई पीर को अपनी पीर समझकर दूर करनेवाला पीर हो जाए तो सारे अनाथाश्राम, विधवाश्रम, वृद्धाश्रम, बालाश्रम समाप्त हो जाएंगे।
14)    यदि तुम डॉक्टर हो, वकील हो, शिक्षक हो, सलाहकार हो, इंजीनियर हो तो चलते-फिरते यह सब हो जाओ। तुम चलते-फिरते डॉक्टर हो जाओ, चलते-फिरते वकील आदि-आदि हो जाओ। इससे तुम्हारा जीवन स्वर्ग हो जाएगा और समाज भी सुखी हो जाएगा। ‘भापा’ चलता-फिरता उपरोक्त सभी कुछ है।
ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

Thursday, September 30, 2010

"अज्ञानबघारू है प्रजानन"

      अज्ञानबघारू है प्रजानन। न जानने पर भी उस विषय में धडल्ले से बकनेवाले को अज्ञान बघारू कहते हैं। इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, वकीलीशैक्षिकी, वैज्ञानिकी, ज्ञानशून्य एवं अत्यल्पज्ञ होने पर भी इनके सम्मेलनों में आनतान रटे रटाए भाषण देने वाला व्यक्ति प्रजानन अज्ञानबघारू होता है। बघार कहते हैं संस्कार करने को। अज्ञान संस्कार रोपने वाले को अज्ञानबघारू कहते हैं।
            न भाजपा, न राजद, न कांग्रेस, न कम्युनिस्ट, न स.पा. आदि के किसी भी प्रजानन को वैज्ञानिक विधि की समझ है। वैज्ञानिक विधि विज्ञान की आत्मा है। पर सारे प्रजानन संस्कृतिकरण, भगवाकरण पर बिना समझे पक्ष विपक्ष में हजारों वक्तव्य अज्ञानबघारू हैं। इन्हें यह नहीं मालूम कि भारतीय संस्कृति की हर पुस्तक (नाटक काव्य भी) वैज्ञानिक विधि के प्रकृष्ट प्रयोग द्वारा ही लिखी गई है। अतः वैज्ञानिक ही है।

“अनात्म व्यवहारू, आत्म-हत्यारू है प्रजानन”

     अनात्म व्यवहारू है प्रजानन। प्रजानन सर्वाधिक अनात्मा या आत्महना होता है। आत्मवत व्यवहार सारे धर्मों की आत्मा है। आत्मवत व्यवहार का सार यह है कि- करो वह ही व्यवहार दूसरे के साथ जो उस परिस्थिति तुम चाहते हो कि दूसरे करें तुम्हारे साथ नकारात्मक सूत्र रूप में मत करो वह व्यवहार दूसरे के साथ जो तुम नहीं चाहते कोई दूसरा करे तुम्हारे साथ 
        एक गर्भवती प्रसूता निकट महिला, एक परीक्षा देने जाता छात्र, एक अस्पताल जाता मरीज, अत्यावश्यक कार्य पर जाता मनुष्य तो मनुष्य सड़क पर नियमबद्ध अपने रास्ते जाता आम आदमी भी कभी नहीं चाहता कि अचानक अकारण उसे रोक दिया जाए। पर प्रजानन वह जीव है जो उपरोक्त सबको अपनी सुरक्षा के बहाने रुकवा देता है। घोर आत्महना है प्रजानन, आत्म-हत्यारू प्रजानन।

"परिवारतारू प्रजानन"

      परिवारतारू होता है प्रजानन। डॉक्टर की बीबी डॉक्टरनी, मास्टर की बीबी मास्टरीन, वकील की बीबी वकीलन, गौटिया की बीबी गौटियन होती है। चाहे वह ठेठ अनपढ़ ही क्यों न हो पर बिना योग्यता डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, मास्टर का बेटा मास्टर, वकील का बेटा वकील, गौटिया का बेटा गौटिया नहीं होता है| पर नेता का बेटे का बेटा भी प्रायः नेता होता है। 
     सच्चा नेता परिवारतारू होता है। प्रजानन दशानन से घातक है। दशानन का कोई बेटा दशानन नहीं था, कोई वंज भी दशानन नहीं था। प्रजातन्त्र में मध्यप्रदे के प्रजानन का ज्वलन्त उदाहरण है। हरियाणा राजस्थान बिहार आदि केन्द्र में भी पलड़ा प्रजानन के प्रजानन का ही भारी रहा है। धृतराष्ट्र से कहावत प्रसिद्ध है- अन्धे के अन्धे ही होते हैं  
     प्रजातन्त्र में प्रजानन प्रायः परिवारतारू होता है। शादीशुदा तो शादीशुदा कुंवारे पर भी प्रजानन के प्रजानन नियम लागू होता है।

Monday, September 27, 2010

"सुरक्षा व्यवस्था और प्रजातन्त्र"

    व्यक्ति आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह अपनी शक्ति के कारण रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। 
    आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस से चालीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।  
    आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों में, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है।

"दशानन-प्रजानन-प्रजातन्त्र"

दशानन कहते हैं रावण को जिसमें बताया जाता है कि दस श्रेष्ठ व्यक्तियों का ज्ञान समाहित था। किन्तु परस्त्री भोगेच्छा के कारण अपने समस्त राक्षस कुल एवं राष्ट्र के लिए घातक-पातक था। नौ लाख वर्षों पूर्व के एक गधा सिर रावण को अपनी भूलों के लिए आज तक भी जलाया जाता आ रहा है। आज प्रजातन्त्र में प्रजाननों का बोलबाला है। येन केन प्रकारेण प्रजा के मतों से जीता लाखों गधासिरों से बना है सिर जिसका और इन गधा सिरों पर एक महाधूर्त सियार सिर सिरमौर है जिसका ऐसा दषानन से कहीं घातक, कहीं पातक एम.एल.ए., एम.पी., उपमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री,  प्रधानमन्त्री नामधारी व्यक्ति प्रजानन है। संक्षेप में प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें। प्रजाननों के अधिकार में दस नहीं अनेक आनन हैं। प्रधानमन्त्री ऊंगली की नोक पर मन्त्री बदल सकता है, सचिव बदल सकता है, दशानन के आनन नियत थे। प्रजानन के आनन परिवर्तनशील हैं। हां प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी भी बदल सकता है, अपना आनन भी बदल सकता है। दशानन से कितना खतरनाक, भयानक है प्रजातन्त्र की उपज प्रजानन। अमेरिकी राष्ट्रपति महान प्रजानन के पास कोड शब्द हैं। जिन्हें दबाते ही दनदनाते परमाणु अस्त्र पूरे विश्व को काला कर दे सकते हैं, भून दे सकते हैं। सारी दुनियां को एक बार नहीं कई-कई बार मानव जाति से रहित किया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह सम्भव है।

Thursday, September 23, 2010

"बरबादीआनन्दू हवाकू प्रजानन"

हवाकू प्रजानन। जो धरती पर पैर नहीं रखता वह हवाकू होता है। इसका ही दूसरा नाम विमानू, हेलीकॉप्टरू या उड़न-छू होता है। यह बरबादी से बड़ी दूर का आबादू होता है। बाढ़ बरबादी, भूकम्प बरबादी को हवाई जहाज से देखता है। इससे बरबादियां बड़ी अच्छी दीखती हैं और वह बरबादी पर दूरदर्शनी या हवाई (आकाशवाणियां) भाषण ज्यादा अच्छा दे सकता है। मोटी भाषा में कहा जाए तो यह बरबादी का आनन्द उठानेवाला बरबादीआनन्दू होता है।

"देशी ताल विदेशी अस्पताल और प्रजानन"

देशी ताल विदेशी अस्पताल। प्रजानन सारी उम्र देशी ताल देशी राग बजाता है। पर इलाज विदेशी अस्पतालों में सरकारी खर्चे से कराता है। ढाई करोड़ हर साल इतना मंहंगा इलाज पद गंवा भी कराता हुआ बकवास जीता है। इनके लिए विदेशी इलाज भारत बुलवाता है और झोपडियों में हजारों रामू, भीखू, सोनू, नीना, नोनी, सोहनी, मोनी, सुकटे बदन पिचके तन बेइलाज मर खप जाते हैं।

"बिन नौकरी पेंशन खाऊ हरामखोर प्रजानन"

बिन नौकरी पेंशन खाऊ हरामखोर है प्रजानन। सरकारी नौकर पैंतीस से चालीस साल नौकरी करता घिस जाता है तो पेंशन पाता है और प्रजानन दो वर्ष, पांच वर्ष मौज-मस्ती, सस्ती-सस्ती करके ताउम्र पेंशन सुविधाएं पाता है। धीरे-धीरे देश ऐसी सुविधाभोगियों से भर जाता है और बरबादियों के कगार पर पहुँच जाता है।

Wednesday, September 22, 2010

"फीता-काटू भत्ता-चाटू प्रजानन"

फीता-काटू भत्ता-चाटू ये उपाधियाँ हैं प्रजानन की। विद्यालय, उद्यान, भवन, केन्द्र, सड़क, बांध, उत्सव, दशगात्र, प्रसूति, मरघट फीता काटने दौड़ता भत्ता-चाटू मन्त्री है प्रजानन। जो प्रजानन जितना बड़ा, जो प्रजानन जितना ज्यादा फीता काटू उतना ही बड़ा बकवास टमाटर में कटहल लगाता, कटहल बीज को काजू बताता, दिमाग बेलगाम चलाता वह उतना ही बड़ा पद पाता यही प्रजातन्त्र तमाशा।

"अपने मुंह मियां मिट्ठू प्रजानन"

विज्ञापनी प्रोपेगेंड होता है प्रजानन। "अपने मुंह मियां मिट्ठू, पराए मुंह पूरा सिट्ठू" सरकारी पैसे, जनता के टैक्स काटे पैसे से बड़े बड़े पूरे समाचार पत्र बड़े पेज अपना थोबड़ा फोटू सज अपनी तथा अपनी सरकार के गीत गाता न अघाता; वास्तव में जिसका जमीन पर अस्तित्व नहीं वह पेपर, दूरदर्शन, विज्ञापनों में दिखाता। सौ बार चिल्लाकर बोला झूट जनता को सच लग जाता, पेपर टी.व्ही. को विज्ञापन दाता, उनका खरीददार हो जाता। वे भी इसे लालची हो छापते। बार बार दिखाता, आज तक दिखाता, जी दिखाता, स्टार दिखाता, दूरदर्शन दिखाता, जड़ थोबड़े का समाचार पत्र दिखाता।

"चापलूस प्रजानन"

दुमदार इन्सान का नाम है प्रजानन। आदमी के पीछे कोई दुम नहीं होती। लेकिन प्रजानन के पीछे लम्बी दुम होती है जो पूरे देश में हिलती डोलती है। तथा मालिक के प्रति वफा दर्शाती है। वह भरथरी की भाषा में लांगूल होता है। कुर्सी का कोना पाते ही मालिक (पार्टी अध्यक्ष) के तलवे चाटता है, दुम हिलाता है, उसकी जय बुलवाता है। मालिक प्रवक्ता हो जाता है फिर महाकवि, कभी मुख्यमन्त्री, कभी प्रधानमन्त्री हो जाता है। मालिक के ऊलजलूल को भी महा-ठीक कहता है। वह मालिक के प्रति सच्चा हां-वादी होता है। मालिक को अपनी चमडी का कोट पहनाने को, जूता पहनाने को भी तैयार होता है। मालिक के प्रति तन-मन-धन-जन (समर्थक जन) सहित दीन होता है। मक्खन, घी, स्निग्धता खाता नही, सतत लगाता है और अपनी तरक्की के रास्ते खुलवाता है, प्रमोशन पाता है। मालिक या मालकिन को फिर भी नहीं भूलता। और ज्यादा संसाधनों से अपने बकवासू कामों में भिड़ जाता है, मालिक के मरने का इन्तजार करता है और मालिक के मरने के बाद कभी कभी मालिक हो जाता है अर्थात् स्वयं प्रजानन हो जाता है।

Monday, September 20, 2010

"महाबकवासू प्रजानन"

महाबकवासू होना प्रजानन की विशेष योग्यता है। आन तान बातों को बकवास कहते हैं। प्रजानन वह है जो अन्धा है पर आंख पर भाषण देता है, अनपढ़ है पर शिक्षानीति तय करता है, शराबी होकर शराबबन्दी पर भाषण देता है, आर्थिक लाभ बटोरकर आर्थिक असमानता बढ़ाकर गरीबी हटाओ का नारा लगाता है। इंजीनियरिंग प्रशासनशून्य पर इंजीनियरिंग प्रशासन बखारता है। गृह-नियोजन अयोग्य होकर भी राष्ट्र-नियोजन की बात करता है। और उससे घटिया पेपर- उसका समाचार पत्र उसकी बातें महाबोल्ड करके छापती हैं।

"मतठग प्रजानन "

मतठग एक अन्य नाम है प्रजानन का। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, विवेकानन्दी (अल्पसंख्यक), जैन उर्फ प्रजा सतरंगिया होती है। बपपन में पढ़ा था सतरंगिया को मत छूना काटेगा मर जाओगे। प्रजानन सतरंगिया गिरगिट होता है, रंग बदलता है। मन्दिर में हिन्दू, मस्जिद में मुसलमान, गुरुद्वारे में सिक्ख, गिरजे में ईसाई, विहार में बौद्ध, आश्रम में विवेकानन्दी, तीर्थ में जैनी बनता है, ओर मोटी भाषा में पक्का चार सौ बीस सिद्धान्तखाऊ होता है। इतना चार सौ बीस होता है कि हजारों अलग-अलग सात रंग बटों को भी धोखा दे देता है और उनके मत ठग लेता है।

"खाऊराम प्रजानन"

खाऊराम प्रजानन। जो जितना बड़ा प्रजानन होता है वह उतना ही बड़ा महाभोजखाऊ, देशखाऊ, व्यवस्थाखाऊ, सुविधाएंखाऊ, कानूनखाऊ, चंदाखाऊ, गिफ्टपाऊ, अलंकरण (भारतरत्न और न जाने क्या क्या) पाऊ और परिवारतारू होता है। जो ऐसा नहीं होता वह प्रजानन नहीं होता है, अर्थात् वह दाल-भात या दाल-रोटीखाऊ, होता है। प्रजानन महाभोजखाऊ होता है। महाभोज के आयटम होते हैं- भट्टी का मुर्ग, कटहल की बिर्यानी, बादाम का हलुवा, दाल सात सलामा, जन्नते जमीन, दही तड़का, कुल्फी तिरंगा, हुस्ने-आरा बादशाही तुकड़ा, फिरनी फलों का राजा, पनीर खास टिक्का, मुर्ग वाजिद अलिया और कुन्दन कलिया, चौबीस कॅरेट स्वर्ण वर्क सजीया। ये सब खाने विदेशी जाम पीने के बाद प्रजानन को देश की गरीबी भूखमरी बड़ी साफ दिखाई देती है। और उसका गरीबी पे दिया भाषण सर्वाधिक तालियां लूटता है। तुलसीदास स्वयं को दीन बता दीनबन्धु पूजता था। यह सर्वाधिक पेट भरा हो दूसरे की भूख पर तालियां बटोरता है, पैसा कमाता है। महापेटपूजू भूख-बक् होता है। प्रजानन समूह क्या पिस्ता, काजू, किशमिश, बादाम की पेशाब, लॅट्रिन करते हैं कि इन्हें किचन से भी ज्यादा साफ लॅट्रिन बाथरूम चाहिए? चार घण्टे के कहीं प्रवास पर इनके लिए ढाई लाख रुपये का लघुशौचालय बनता है। ऐसे प्रजानन जब गरीबी हटाने की बात कर भारतरत्न हो जाते हैं तो मानवता सोलह-सोलह आंसू रोती है।

"हाथी तन चूहा मन" कायरों का कायर प्रजानन

हाथी तन चूहा मन प्रजानन। जितना बड़ा प्रजानन होता है उतना ही बड़ा वह चूहा मन हाथी तन होता है। एक चूहा कल्प बादल की छांह तले धोखे से प्रार्थना कर हाथी तन हो गया था। फिर वह सारे जंगल के जानवरों को दूसरे जानवरों से बचाने लगा। खरगोष ने कहा मुझे कुत्ते से भय लगता है। हाथी तन ने कुत्ते को हड़का दिया। हिरण ने कहा मुझे भेड़िये से डर लगता है। हाथी तन ने भेडिये को हडका दिया। चूहे ने कहा मुझे भी एक जानवर से डर लगता है। हाथी तन बोला कौन है अभी भगाता हूँ । उसने हुंकार भरी। चूहे ने कहा वो आ रही है। हाथी तन ने बिल्ली को आते देखा। चूहा मन हाथी तन थर-थर कांपने लगा और भाग गया।

"‘प्रजा-प्रतिनिधि’ कभी नहीं हो सकते ब्रह्म प्रतिनिधि"

‘प्रजा-प्रतिनिधि’ हजारों अश्व शक्ति वाले विमानों के पांवों वाले हैं, शाही प्रीति भोजों से छकने वाले हैं, दूरदर्शन के चकाचौंधी कैमरों से, कैमरों की फ्लैश गनों से चमकने वाले हैं, दक्ष कमांडो से घिरे हुए हैं, रातों रात एक दम प्रजानन बन जाने वाले हैं। कमाण्डो सिंहों से घिरा बुलेट-प्रुफ पहना प्रजानन बुलेट-प्रुफ कार सफर करता, बुलेट-प्रुफ कांच घिरा भाषण देता है। उसका भोजन पहले कुत्ते, खरगोश, डॉक्टर खाते हैं। उनके न मरने पर यह प्रजानन भोग लगाता है। कायरों का कायर, भयभीतों में भयभीत, डरपोकों से डरपोक है प्रजानन। बुलेटप्रुफ कारों वाले हैं, बारह हजारी चश्मों वाले हैं, मिन्ट कोटों वाले हैं, ये किसीं भी स्तर आदमी नहीं हैं। ये किसी भी स्तर ब्रह्म प्रतिनिधि हो ही नहीं सकते हैं। ये सब ”प्रजा प्रतिनिधि“ प्रजानन प्रजातन्त्र की ही उपज हैं।

"कैसे कैसे ये देशरत्न "

प्रजातन्त्र व्यवस्था में चूहा मत बटोर ले तो मुकुट का अधिकारी हो जाता है। कुत्ता मत बटोर ले तो वह राजसिंहासन पर बैठ जाता है। पर क्या मुकुट पहनने से, राजसिंहासन बैठने से इनकी आदतें कुतरनें, जूता काटने की छूटती हैं? प्रजातन्त्र व्यवस्था में चूहे को कुत्ते को हजारों पांव, हजारों हाथ, हजारों सिर दे दिए जाते हैं वह प्रजानन हो जाता है। और कालान्तर में इन हाथों का यदि वह पांच प्रतिशत भी प्रयोग कर लेता है तो उसे कुछ बौने प्रजानन देशरत्न, देशसपूत की उपाधियां दे दिया करते हैं।

"प्रजानन कि सुरक्षा"

"वाय्" अंग्रेजी का पच्चीसवां अक्षर है। "जेड" छब्बीसवां अक्षर है। ‘ए’ ‘बी’ ‘सी’ आदि तो भिखमंगे, भिखारी, बाइयां, रिक्शेवाले, श्रमिकादि श्रेणियां हैं जिन्हें गलि का कुत्ता भोंक सुरक्षा या ‘ए’ सुरक्षा प्राप्त है। प्रजानन वह है जिसे छब्बीसवीं सुरक्षा ‘जेड’ सुरक्षा प्राप्त है। यह ढाई करोड़ी है। प्रजानन, प्रति प्रजानन (विपक्षी नेता), ‘भ’ प्रजानन (भविष्य प्रजानन, प्रजानन वंश), भू प्रजानन (भूत प्रजानन), जेड सुरक्षा, चमचम घेरा इज्जती घेरा जीते हैं और सोचते हैं अंग्रजी में सत्ताइसवां अक्षर क्यों नहीं होता?

"प्रजानन"

    दशानन कहते हैं रावण को जिसमें बताया जाता है कि दस श्रेष्ठ व्यक्तियों का ज्ञान समाहित था। किन्तु परस्त्री भोगेच्छा के कारण अपने समस्त राक्षस कुल एवं राष्ट्र के लिए घातक-पातक था। नौ लाख वर्षों पूर्व के एक गधा सिर रावण को अपनी भूलों के लिए आज तक भी जलाया जाता आ रहा है। आज प्रजातन्त्र में प्रजाननों का बोलबाला है। येन केन प्रकारेण प्रजा के मतों से जीता लाखों गधासिरों से बना है सिर जिसका और इन गधा सिरों पर एक महाधूर्त सियार सिर सिरमौर है जिसका ऐसा दशानन से कहीं घातक, कहीं पातक एम.एल.ए., एम.पी., उपमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री नामधारी व्यक्ति प्रजानन है। संक्षेप में प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें। प्रजाननों के अधिकार में दस नहीं अनेक आनन हैं। प्रधानमन्त्री ऊंगली की नोक पर मन्त्री बदल सकता है, सचिव बदल सकता है, दशानन के आनन नियत थे। प्रजानन के आनन परिवर्तनशील हैं। हां प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी भी बदल सकता है, अपना आनन भी बदल सकता है। दशानन से कितना खतरनाक, भयानक है प्रजातन्त्र की उपज प्रजानन। अमेरिकी राष्ट्रपति महान प्रजानन के पास कोड शब्द हैं। जिन्हें दबाते ही दनदनाते परमाणु अस्त्र पूरे विश्व को काला कर दे सकते हैं, भून दे सकते हैं। सारी दुनियां को एक बार नहीं कई-कई बार मानव जाति से रहित किया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह सम्भव है।
    व्यक्ति आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह अपनी शक्ति के कारण रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों में, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है। आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस से चालीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।

Friday, September 17, 2010

"लोकशक्ति एवं प्रजातन्त्र"

    प्रजातन्त्र के तीन आधारस्तम्भ माने जाते हैं। 1. न्याय व्यवस्था, 2. प्रशासन व्यवस्था, 3. विधायी व्यवस्था। समाचार पत्र व्ययं को प्रजातन्त्र का चौथा आधारस्तम्भ कहते हैं। यह अति दुःखद तथ्य है कि ‘लोकशक्ति’ को प्रजातन्त्र में प्रत्यक्षतः चुनाव के अतिरिक्त सुव्यवस्थित तरीके से कोई स्थान नहीं दिया गया है। प्रजातन्त्र का चौथा आधारस्तम्भ है लोकशक्ति। न्याय, प्रशासन, विधायी एवं लोकशक्ति के आधारस्तम्भ में लोकशक्ति का पच्चीस प्रतिशत आधार पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण है। अन्य तीन न्याय, प्रशासन, विधायी पचहत्तर प्रतिशत होते हुए भी पच्चीस प्रतिशत महत्वपूर्ण है। यह अति दुःखद तथ्य है कि वर्तमान प्रजातन्त्र में विधायी शक्ति का तैंतीस एक बटे तीन प्रतिशत पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण हो गया है। तथा लोकशक्ति को चुनावों के अतिरिक्त कोई महत्ता प्राप्त ही नहीं है। वर्तमान प्रजातन्त्र में ‘विधाई शक्ति’ पार्टियों, आपसी विरोधों, सस्ती मुहावरेबाजियों, गालियों लड़ाई-झगडों, सत्तालोलुपता, वंशवाद, धनलोलुपता, कुर्सीलालसाओं, यशेषणाओं आदि में तितिर बितिर बिखरी हुई अपने मूल दाईत्वों से हीन भटकी भटकी लावारिस हो गई है। भतृहरी (राजा भरथरी) ने राजनीति को वेश्या कहा था। उसने कहा था कि कभी सच्ची कभी झूठी (अवसरवादिता), कभी कठोर वचन बोलती कभी मधुर वचन बोलती (अनिश्चित), कहीं मारनेवाली कहीं दया करने वाली (ऊलजलूल), कहीं लोभ भरी कहीं दान में दक्ष (ड़ांवाडोल), कभी बहुत संग्रह करनेवाली कभी प्रचुर व्यय करनेवाली (अविवेकी) इस प्रकार वेश्या के समान राजनीति अनेकरूपा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नें प्रजातन्त्र को बांझ और वेश्या अर्थात वेश्या से भी बदतर वेश्या कहा था। वह ऐसा है भी वर्तमान विधायी शक्ति पांच वर्षांे तक लोकशक्ति का मटियामेट करती रहती है। तथा न्यायशक्ति एवं प्रशासन शक्ति का घटियाकरण करती रहती है। ऐसा क्यों होता है?
    प्रजातन्त्र में जनता द्वारा जननायकों के हाथों मतपत्रों द्वारा सत्ता का हस्तान्तरण होता है। इस हस्तान्तरण का प्रभावी प्रभाव सत्ता पर मात्र 22-20 प्रतिशत ही होता है। औसत पचास प्रतिशत मत पड़ते हैं। इनमें 40-45 प्रतिशत मत प्राप्त राजनैतिक दल जीत जाता है और विधायी व्यवस्था सत्ता हथिया लेता है। यह सत्ता हस्तान्तरण का मजाक है। कहा जाता है प्रजातन्त्र प्रजा का, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए है। लेकिन वास्तव में पजातन्त्री चुनाव प्रक्रिया ही इस सिद्धान्त की मूल रूप में हत्या करती है। लोकशक्ति का पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण आधारस्तम्भ प्रजातन्त्र प्रक्रिया में आधारहीन ढह जाता है। प्रजा का, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए वास्तव में बीस प्रतिशत का बीस प्रतिशत द्वारा यथार्थतः बीस प्रतिशत के लिए पर नाटक प्रजा के लिए रह जाता है। और इस नाटक का जनता को कोई लाभ नहीं मिलता है।
    बीमार लोकशक्ति व्यवस्था प्रजातन्त्र को प्रजातन्त्र ही नहीं रहने देती है। इसका समाधान प्रजातन्त्र के किसी भी संविधान के पास नहीं है। इसका समाधान प्रजतन्त्र के पास है। किसी भी राष्ट्र के समस्त व्यक्तियों को अनुभव तथा शिक्षा के संयुक्त अंकों के आधार पर स्तरीकरण द्वारा सोपानबद्ध कर सोपानानुसार महत्ता और समस्त व्यक्तियों की हर विधाई व्यवस्था में सर्वेक्षण भागीदारी प्रजतन्त्र है। सोपानानुसार श्रेणीबद्धता न्याय व्यवस्था है। सर्वेक्षण भागीदारी सतत पूर्ण सत्ता हस्तान्तरण है। सर्वेक्षण भागीदारी अनिवार्य होगी। विधायी प्रारूप या समस्या के पक्ष तथा विपक्ष में सुझाव रायों को इकत्रित कर पक्ष विपक्ष के मुद्दों का पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्तानुसार विश्लेषण करके तितली चित्र द्वारा निष्कर्ष निकाल विधायी निर्णय लिए जाएंगे। विश्लेषणकर्ता विधायी निर्णय लेनेवाले सर्वोच्च सोपानासीन पांच सौ पच्चीस व्यक्ति सत्यज्ञ होंगे। विधायी सत्यज्ञ न्याय, शिक्षा एवं प्रशासन क्षेत्रों के सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति मात्र साठ वर्ष तक की उम्र तक के होंगे। विधायी निर्णयों के लिए प्रतिमाह दो दिवस सत्यज्ञों की बैठक होगी। प्रजतन्त्र चुनाव रहित, बकवासी राजनीति रहित, अनावश्यक सुरक्षा व्यवस्था रहित अति व्ही.आय.पी. रहित, प्रजानन (दशानन से अधिक घातक) रहित, हर व्यक्ति (प्रज) को इज्जत सहित, हर व्यक्ति को उसकी आय के निश्चित प्रतिशत रूप में केवल एक ही कर सहित बाकी सारे उन्मुक्त, प्रजा की विधायी व्यवस्था में शत प्रतिशत सतत भागीदारी सहित, परिवर्तनीय सत्यज्ञों की, मात्र शाश्वत प्राकृतिक एवं शाश्वत नैतिक शिक्षामयी व्यवस्था होगी। यह योग्यतम सत्यज्ञों, प्रजों द्वारा प्रजा को प्रजा के लिए व्यवस्था होगी। 
....डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (छत्तीसगढ़)

“प्रजातन्त्र और जनप्रतिनिधि”

    संसदीय प्रणाली की आत्मा है संसद। संसद का जीवित घटक है सांसद। सांसद जनप्रतिनिधि है। जन का अर्थ है प्रजा। खिचड़ी लोगों का नाम है प्रजा। खिचड़ी लोग जब एकल मताधिकार द्वारा अपनी अपनी सत्ता का हस्तान्तरण करते हैं तो जन-प्रतिनिधि चुने जाते हैं। विचारों की खिचड़ी व्यवस्था है राजनैतिक दल। संसद में संख्यानुसार राजनैतिक दलों को मान्यता मिलती है। फिर वहां दो पक्ष हो जाते हैं। एक सत्ता पक्ष दूसरा विपक्ष। सत्ता और विपक्ष भी आजकल खिचड़ी हो गए हैं। खिचड़ी बीमार का भोजन है। यदि यह खिचड़ी भी कंकड़भरी हो तो वह गरीब बीमार का भोजन हो जाती है। विश्व के प्रजातन्त्री देशों में संसद या संसदीय उपसंस्थाएं विधानसभा आदि कंकड़ी खिचड़ी हैं। यही कारण है कि विश्व की संसदों और विधानसभाओं में भयानक तू तू मैं मैं, गाली-गलौच, हाथापाई, शोर-शराबा, हंगामा, विचारहीनता आदि अतिआम बाते हैं। तथा कई बार तो ये स्थितियां कपड़े फाड़, साड़ी-फाड़, माईक-तोड़, धोती-उतार, कुर्सियां तोड़ आदि तक पहंुच जाती हैं।
        प्रजातन्त्री आजादी की आम प्रवृत्ति मध्यमान गति औसतीकरण की ओर होती है। औसतीकरण में बहुभाग निम्नवर्ग, अशिक्षित भूखे, निर्धनों का होता है। जिनकी आम सोच पैसे और भूख तथा आवश्यकताओं तक ही होती है। ऐसे लोगों के बहुमत (प्रायः विजय 20-30 प्रतिशत आधार पर होती है) से चुने जन प्रतिनिधियों की योग्यता हमेशा संदिग्ध रहती है। चयनकर्ता स्वयं से श्रेष्ठ का चयन औसतः न तो करता है न तो कर सकता है। यह व्यक्तिगत नियम सार्वजनिक होकर औसतीकरण के कारण और घटिया हो जाता है। यही कारण है कि जन-प्रतिनिधियों की संसदें एक आखाड़ा बन जाती हैं।
        ऑस्ट्रेलियन संसद में नेता प्रतिपक्ष ने पानी से भरा गिलास प्रधानमन्त्री को दे मारा था। जापान की डाईट (संसद) में इस सीमा तक खुली मारपीट हुई थी कि पुलिस बुलानी पड़ी थी। फ्रांस का सदन तो हंगामों के लिए प्रसिद्ध है। संसदों की जननी ब्रिटेन की पुरानी संसद का इतिहास खून से रंगा है। अब भी वहां यदा कदा हंगामा शोरगुल हो जाता है। भारतीय संसद वर्ष 2001 में बजट सत्र में 74 घंटे, मानसून सत्र में 28 घंटे, शरद सत्र में 15 घंटे हंगामे के कारण नहीं चली। उत्तरप्रदेश में 1998 में विधानसभा का लहूलुहान खुनी काण्ड हुआ। कई विधायक घायल हुए। जुलाई 2000 में महाराष्ट्र विधानसभा में माईकों, पेपरवेटों, कुर्सियों के हाथियारों से जंग लड़ी गई। वर्ष 2001 में      मध्यप्रदेश विधानसभा 5 दिन तक नहीं चली। नगरपालिकाओं, पंचायतों, निगमों की स्थितियां इससे भी बदतर हैं। सदन कुण्ड में जाने, हंगामा करने, चिल्लाने, बैठकें स्थगित कराने, पक्ष-विपक्ष को नहीं बोलने देने, अभिभाषण विरोध आदि दैनंदिनी की बातें हैं।
        राजनैतिक दलों का इस सबको समर्थन है। इसलिए पिछले पचास वर्षों में किसी भी राजनैतिक दल ने किसी भी सदस्य को हंगामे, उद्दण्डता, मारपीट, लड़ाई, गाली-गलौंच के लिए दंडित नहीं किया। प्रजातन्त्र चुनाव की भी यही भाषा है कि हंगामादारों के लिए दुबारा चुनाव जीतना आसान होता है। बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? जया, लालू सर्वाधिक प्रसिद्ध, विश्वप्रसिद्ध मुख्यमन्त्री है।
        प्रजातन्त्र का सिद्धान्त है कि जन- जनप्रतिनिधि को सत्ता हस्तांतरित करते हैं। एक पत्नी अपने पति को या पति अपने पत्नी को, पिता पुत्र को या पुत्र पिता को, मित्र मित्र को भी पूरी सत्ता हस्तांतरित नहीं कर सकता है। इनका संबंध अतिसीमित व्यक्ति व्यक्ति स्तर का रहता है। वास्तव में हर व्यक्तित्व अपूर्व तथा विशिष्ट है। प्रजातन्त्र में जन (कई व्यक्ति) जनप्रतिनिधि को राष्ट्र सन्दर्भ या प्रान्त या नगर सन्दर्भ में सत्ता हस्तांतरण करते हैं। जो वास्तव में कभी नहीं होता। कोई भी जनप्रतिनिधि प्रजातन्त्री इतिहास में इतना बड़ा नहीं हुआ है जिसे स्वेच्छया सच्चे तौर पर जन ने सत्ता हस्तांतरित की हो। प्रजातन्त्र धर्म निरपेक्ष होता है जबकि धर्म में स्वतः सत्ता हस्तांतरण होता है कि उसमें श्रद्धा या    अन्धश्रद्धा का बोलबाला रहता है। धार्मिक सत्ता हस्तांतरण प्रायः दीर्घकाल में मुर्दा महापुरुषों को जिलाए रखने के लिए अपनी हस्ती बचाने के लिए कुछ धूर्तों द्वारा चलाए आन्दोलन के कारण होता है। सच्चे धर्म में सत्ता हस्तांतरण मात्र ब्रह्म को होता है। सत्ता हस्तांतरण प्रजातन्त्र की एक कमजोर कड़ी है जो प्रजातन्त्र को मजाक बनाकर रख देती है।
        यदि धोखे से गलती से सत्ता हस्तांतरण की बात मान भी ली जाए तो भी प्रजातन्त्र एक बकवास व्यवस्था ठहरती है कि इसमें जनप्रतिनिधि को बीस प्रतिशत तो सत्ता हस्तान्तरण होता है। अस्सी प्रतिशत तो सत्ता अहस्तान्तरण होता है। अतः जनप्रतिनिधि अ-जन प्रतिनिधि होता है।
        इस प्रकार प्रजातन्त्र की संसदीय प्रणाली में जो जनप्रतिनिधि आधारित हैं कंकड़ीय खिचड़ी हो जाती है जो किसी के खानेलायक नहीं होती। इसी कारण संसदीय प्रणाली में किए गए    सुधार प्रयास संसद द्वारा ही रौंद दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्ताव पास हुआ कि सदन के गर्भगृह में जानेवाला विधायक स्वतः सात दिवस निलंबित माना जाएगा। और तीसरे या चौथे दिन ही गर्भ गृह में उस प्रस्ताव का कचूमर निकल गया। 1992 में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा ग्यारह सूत्री अनुशासन नियम सदन सदस्यों हेतु आम सहमति से (प्रजातन्त्र व्यवस्था के उच्चतम प्रारूप से) बनाए गए पर आज तक उन नियमों की सारे सदस्य (कभी पक्ष कभी विपक्ष) सरे आम हत्या ही करते रहे हैं। वर्तमान में साठसूत्रीय आचरण संहिता लोक सभाध्यक्ष द्वारा उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, नेता प्रतिपक्ष, संसद विधानसभा के    पीठाधीन अधिकारी राज्यों के मुख्यमन्त्रियों तथा विपक्ष नेताओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार की है। अभी सत्र शुरु नहीं हुआ है पर विपक्ष के प्रवक्ताओं ने दूरदर्शन पर पहले ही साठ सूत्रों की हत्या या उग्रविरोध की योजना प्रस्तुत कर दी है।
        संसद सत्र के पहले दिन ही साठसूत्री अनुशासन तहस नहस फहस सड़स होकर रह गया। मैंने देखा संसद भव्य है। आलीशान कुर्सियां तहदार आधारपीठ गद्देदार है। धूल रहित भवनस्वच्छता पंचतारा होटल मात अर्थात सप्ततारा है। माईक व्यवस्था विश्वश्रेष्ठ है। महापुरुषों के चित्र स्वच्छपाक हैं। व्यवस्था सुनियाजित, क्रमबद्ध, पाकसाफ, अघोरचक्षुणी है। यह प्रजातन्त्र का आलीशान मन्दिर है। हर कोना, हर ओर, हर छोर भव्य है स्वच्छ है। और इसके कुछ देवता तितिर बितिर कुर्सियों पर विद्यमान हैं। और बाकी हाथ उठा-उठा चिल्ला रहे हैं। यहां से बदस्वाद बाजार से भी घटिया खिचड़ी शोर है। सब्जी बाजारी शोर अपनी अपनी सब्जी भाव चिल्लाने बेचने का शोर होता है। यहां तो कीचड़ उछाल शोर है। जड़भवन, कुर्सियां, चित्र, सप्ततारा सफाई, माईक व्यवस्था पशुघटिया आदमी सहजतः अपमानित कर देता है।
        यही माहौल जड़-भवन, कुर्सियों, चित्रों, सप्ततारा सफाई तथा मखौल दूसरे या तीसरे दिन भी रहा। पांच मिनट में संसद सभा स्थगित हो गई ग्यारह पांच बजे यह हुआ। ग्यारह पच्चीस संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। भिलाई में स्मृतिनगर में संगम होटल के सामने बातचीत में कुछ व्यक्तियों ने कहा- ”साले सारे मर गए होते तो अच्छा था“। मैं चलते चलते रुक गया। मैंने कहा- ”उससे होगा क्या? सब दुबारा तिबारा हो जाएंगे पैदा। प्रजातन्त्र है इनकी कु-माता। प्रजा है इनका कु-पिता। व्यवस्था हत्या है इलाज इसका।“ और उनके हाथ प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज का पत्रक मैंने दिया थमा।
        लौटा मैं सोचता सोचता कब होगी प्रजातन्त्र हत्या?
        कहावत है एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा करती है। संकीर्ण विचार मानव समाज की गंदी मछली है। सम्प्रदाय (मैं भर ठीक) गंदी मछली समूह है। इसी प्रकार राजनैतिक दल (मेरी टोपी ठीक) गंदी मछली समूह है। साहित्य में प्रतिबद्धता या वाद गंदी मछली समूह है। दबाव समूह गंदी मछली समूह है। प्रजातन्त्र का आधार गंदी मछली समूह का स्वीकार है। इससे सारा का सारा देश तालाब ही गंदला हो जाता है, हो रहा है। देश बचाओ, प्रजातन्त्र हटाओ, प्रतिजनतन्त्र लाओ!
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी, 
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

“प्रजतन्त्र बनाम प्रजातन्त्र”

    प्रजातन्त्र का जवाब हैं प्रजतन्त्र। प्रजतन्त्र ही स्वतन्त्र, स्वाधीन, स्वस्थ, स्वस्ति शब्दों को सार्थक कर सकता है। इसका आधार प्रजानन के स्थान पर “स्वानन” है । प्रजा में अपना चेहरा घोर विकृत प्रत्यय है। स्व में अपना चेहरा सटीक सही प्रत्यय है। "जो तुम हो वही है दूसरा" यही प्रजतन्त्र है। “आत्मा की उपमा से हर व्यवहार” है प्रजतन्त्र। “समस्त प्राणियों को आत्मवत जानना तथा उनसे आत्मवत व्यवहार तथा उनका उल्लंघन मात्रानुसार अपराध एवं दण्डनीय” यह प्रजतन्त्र का संविधान तथा कानून है। सरल एवं सहज कानून जो हर प्रज जानता है। यही प्रतिजन-तन्त्र है। प्रतिजन = प्रज = स्व = आदमी।
    प्रति-जन-तन्त्र व्यवस्था है योग्यता व्यवस्था। एक स्कूल व्यवस्था के समान जहां शिक्षा ही योग्यता का आधार है। तथा डेढ़ हजार विधार्थियों को योग्यतानुसार क्रमबद्ध किया जा सकता है। ग्यारहवीं का सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति प्रथम उच्च श्रेणी पर तथा पहली का न्यूनतम अंक प्राप्त व्यक्ति सबसे निम्न सीढी पर रहता है।
    उपरोक्त शिक्षांक योजना एवं अनुभवांक योजना के सम्मिश्र रूप के क्रमों पर हर सामाजिक को बांट देना ही प्रतिजनतन्त्र है या प्रजतन्त्र है।
    प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र निदान है अशिक्षा का। इसमें शिक्षा द्वार से गुजरे बिना कोई सफल नहीं हो सकता। अतः नई पीढ़ी के आते आते हर व्यक्ति शिक्षित होगा ही।
    प्रजतन्त्र निदान है विकृत दबाव समूहों का, हड़तालों का, मांगों का, बन्दों का, हुडदंगों का, चुनावी धोखों का, स्टण्टो का, इसमें निर्णय गुणवत्ता, आवश्यकता, बौद्धिकता पर लिए जाते हैं।
    प्रजतन्त्र स्थाई, अस्थाई, व्यक्ति, योग्यता, अनुभव समन्वय है। 58 वर्ष पर सेवा निवृत्ति वह आधार है जो इसके स्वरूप को परिवर्तनीय बनाती है।
    प्रजतन्त्र में आधार प्रत्यय “प्रज” = व्यक्ति है जिसमें थोडे प्रयास से बडी उन्नति व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर सकता है। प्रजातन्त्र में आधार प्रत्यय ”प्रजा“ है। जिसमें उन्नति, अवनति में वर्षों तक कोई अन्तर भी पता नहीं चलता।
    हिटलर व्यवस्था “विकृत प्रजतन्त्र” थी। उसमें भी जर्मनी मानव ने अभूतपूर्व उन्नति की थी। जनता दो तिहाई ऋणावस्था से धनात्मक अवस्था तक पहुंची थी। विश्व के किसी सामान्य प्रजातन्त्र ने इतनी उन्नति नहीं की है। अधिकांश प्रजातन्त्र आजादी पश्चात् वर्ष दो वर्ष के कुल आप जितने ऋणांे में डूबे हैं निर्धन राष्ट्रों के शोषक राष्ट्रों की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। स्वस्थ ”प्रजतन्त्र“ ही विश्व मानव उन्नति का एकमात्र आधार है।
    विश्व इतिहास गवाह है कि स्व-यम्, स्व-तन्त्र, स्व- आधीन, स्व-अस्ति, स्व-स्थ व्यक्ति ही महापुरुष हुए हैं। जो भी ”स्व“ से जुडा नहींे हैं वह इतिहास रचने के, नेता होने के अयोग्य है। प्रतिजन-तन्त्र या प्रज-तन्त्र या स्व-तन्त्र व्यवस्था स्व आधारित है। इसमें कई-कई इतिहास रचने के सम्भावनाएं हैं। प्रजातन्त्र इस अर्थ में बंजर है। इसके करीब-करीब सारे नेता इतिहास रचने के अयोग्य, प्रजामतों के द्वारा हत या छोटे किए गए होते हैं। प्रजतन्त्र में महापुरुष पूर्ण प्रजा से उच्च रहते अपने जीवन से उच्चता की ओर प्रेरित होती है। जनता स्वेच्छया उच्चता की ओर प्रेरित होती है। प्रजातन्त्र में व्यवस्था उलटी है। प्रजानन योग्यों को निम्नता देता है तथा अयोग्योें का मत बटोरने निम्न का समर्थन करता है।
    ”प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज“ लिखने का उद्देश्य प्रजातन्त्र को प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र या स्वतन्त्र द्वारा प्रतिस्थापित करना है। हर उस व्यक्ति से जो "प्रज" है "स्वयं" है यह अनुरोध है कि वह अपनी-अपनी प्रजता के लिए संघर्ष करे तथा प्रजातन्त्र समर्थित प्रजानन व्यवस्था समेत प्रजातन्त्र को समाप्त करने का प्रयास करे।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी, बी.ई., एल.एल.बी.,
डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

"शतरंज राजतन्त्र प्रजातन्त्र"

    शतरंज निठल्लों का खेल है। राजनीति भी निठल्लों का खेल है। शतरंज और राजनीति में जो डूबा सो ऐसा डूबा कि कभी भी उबर नहीं सका। शतरंज के खिलाड़ियों को न युद्ध की परवाह होती है, न बाढ़ की न घर की। उनका सारा ध्यान चौसठ खानों तथा पैदल, हाथी, घोड़े, ऊंट और वज़ीर पर सिमटा रहता है, जो दुबके राजा को बचाने का प्रयास करते रहते हैं।
    राजनीति के भी खिलाड़ियों को न घर की परवाह होती है, न बाहर की। उनका सारा ध्यान चौसठ मन्त्री पदों पर लगा रहता है। जिसके लिए वे कभी पैदल, कभी हाथी, कभी ऊंट का रोल अदा करते रहते हैं। शतरंज और राजनीति दोनों ही मारकाट के खेल हैं। खेल बोर्ड में या देश में होता है, लेकिन दोनों पक्षों के दिमाग में मारकाट की भयानक साजिश चलती रहती है।
    राजातन्त्र का शतरंज युद्ध और प्रजातन्त्र का शतरंज युद्ध एक दूसरे के सर को बल खड़ा पाते हैं। राजातन्त्र शतरंज पुराने नियमों पर आधारित था। जिसमें यदि कोई मुहरा दूसरे के जोर पर है तो उसे नहीं मारा जा सकता, चाहे वह पैदल का ही क्यों न हो। परिणामतः पैदल के जोर पर वज़ीर, घाड़े, हाथी, ऊंट आगे रहते थे तथा उनके मरने के बाद पैदल मरते थे। राजा, सेनापति युद्ध के सहभागी होते थे, अग्रिम मोर्चा संभालते थे। सारे वार उन्हें झेलने पड़ते थे। प्रायः वे ही पहले मरते थे।
    प्रजातन्त्र शतरंज में पैदल दो-दो घर चल सकता है। वह आगे रहता है। मरने मारने का जोर से कोई सम्बन्ध नहीं, जो जिसे चाहे जोर-बेजोर मार सकता है। इस युद्ध व्यवस्था में सेनापति, राजा युद्धक्षेत्र जाते भी नहीं हैं, सुदूर प्रचालन से पैदलों सैनिकों को लड़ाते हैं। मरते पैदल हैं।
    अंग्रेजों ने भारत बोर्ड पर जो शतरंज खेला उसमें सफेद-काले मुहरे हिन्दू- मुसलमान थे, जो ज्यादा करके पैदल थे। अंग्रेजों के हाथी, घोड़े आदि पैदलों को आखरी खाने में पहुंचने से रोकते रहे, कहीं वे वज़ीर न बन जाएं। अंग्रेज  शतरंज-खेल खेलकर चले गए और गोरे अंग्रेज गोरे कपड़ों वालों को शासन दे गए। गोरे कपड़ों वालों नें सारी शतरंज अंग्रेजों से ही सीखी थी। इनके सिरमौर वहीं खेलें खाए थे। वे लार्ड मैकाले और मैकियाविली के प्रिंस थे। इन्होंने देश में नई शतरंज पैदा की। भाषाई पैदल बनाए, साम्प्रदायिक पैदल बनाए। हिन्दुओं में भी, मुसलमानों में भी सफेद-काले मुहरे बनाए। और कई बार तो काल्पनिक रेखाओं से बंटे घर के टुकड़ों से भी हाथी, घोड़ा, ऊंट बनाकर शतरंज खेला। पैदलों को आगे कर-कर के कुचला। इतना कुचला कि आज हर पैदल कराह रहा है हर पैदल घायल है। तब बादशाहों को शतरंज का कभी कदा शौक चर्राता था, तो वे अपने बत्तीस सैनिक चुन लेते थे। चौसठ खानों का बड़ा मैदान बना लेते थे। दोनों अटारियों पर रानियों समेत वे काले सफेद वेशभूषाधारी पैदल, हाथी, घोड़ा, ऊंट सैनिकों को खानों में हर चाल पर वास्तव में जाने को निर्देश देते थे। सैनिकों को उनकी आज्ञाओं पर मरना पड़ता था। दो राजा कम बत्तीस याने तीस सैनिक एक खेल में मारे जाते थे। आज जब प्रजानन, राजनेता, पक्ष-विपक्षी शतरंज खेलते हैं तो कभी मण्डल, कभी कमण्डल, कभी अण्डल, कभी बण्डल, कहीं पंजाब, कहीं आसाम, कहीं कश्मीर में रोज काले-सफेद पैदल मारे जाते हैं ये घिनौना शतरंज फौरन बन्द होना चाहिए। जनता भले ही आठ पैदलीय शतरंजी पैदल हो; बुद्धिजीवी न तो पैदल बने, न इस व्यवस्था के हाथी, घोड़े, ऊंट ही बने।
    शतरंज की हार सबसे बुरी हार होती है। जुए से भी बुरी हार। हारनेवाले की आत्मा तक गहरी उतर जाती है। एक बार मैं अन्ध विद्यालय के एक बच्चे से शतरंज में हार गया था। वह अन्धा बच्चा मेरी तुलना में शतरंज बोर्ड तथा मोहरों की स्थिति अधिक देख सकता था। उसकी ऊंगलियों में आंखें थीं। फैली हथेलियां हर मोहरे की स्थिति पकड़ लेती थीं। उसके दिमाग का शब्द चित्र महान था। मैं अपने कालेज का श्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ी हार गया था। वह गौरवमय हार थी। पर आज तक वह हार साए के समान मेरे साथ है। उस अन्धे चौदह वर्षीय शतरंज के खिलाड़ी में विश्व चॅम्पियन बनने की सम्भावनाएं थीं। पर व्यवस्था उससे ज्यादा अन्धी थी इसलिए उसे न देख सकी। खैर शतरंज की हार कभी नहीं भूलती।
    राजनीति की हार भी कभी नहीं भूलती। हारा राजनीतिज्ञ आत्मा तक हिल जाता है। दुबारा लड़ता है। धरतीपकड़ नाम का एक उत्तम व्यक्तित्व अभी सत्रह स्थानों से लड़ा है। उस पर कई हारों का काला नशा है। उसे अभी तक समझ नहीं आई राजनैतिक शतरंज की। उसनें जनता को काला, गोरा, लाल, सफेद नहीं बांटा। जिसने पैदल मारनेवाले हाथी, घोड़े, ऊंट नहीं रचे वो भला प्रजातन्त्र शतरंज में क्या जीतेगा? उसे उम्रभर हारना है। उम्रभर चुनाव लड़ना है क्योंकि हार उसकी आत्मा तक पहुंच चुकी है। प्रजातन्त्र शतरंज में अरे बुद्धिजीवियों! तुम सब धरतीपकड़ हो। सर्वाधिक धरतीपकड़ कीड़े, मकोड़े, चींटी, दीमक आदि होते हैं। तुम्हारी हस्ती ही क्या है? पांच लाख मतों में चार-पांचसौ वोटों की। हा! अपने पे किसान, दीप, पंजे, कमल आदि का दाग लगवा लो तो हस्ती बढ़ जाएगी। चरवाह जानवरों को पहचाान के लिए दागता है। प्रजातन्त्र यही दगनी व्यवस्था है। दागित मत हो! मेरा आह्नान है गलत व्यवस्था के गलत आकलन से स्वयं को कम मत समझो। व्यवस्था तोड़ बनो। सुकरात, ब्रूनो, स्पिनोजा, गैलीलियो, दयानन्द बनो। राजनैतिक शतरंज की घिनौनी बिसात उलट दो।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (छत्तीसगढ़)

"दशानन से घातक प्रजानन"

    दस आनन सा बल है जिस एक आनन में वह है दशानन। बाद में यह अर्थ बदलता गया, और रावण दस सिरोंवाला बीस हाथोंवाला बना दिया गया। बीस पैरोंवाला रावण अभी नहीं हुआ है, अलबत्ता उसके दस आननों में एक गधा सिर जरूर जोड़ दिया गया है। नौ सिरों की महत्ता एक गधा सिर डुबो देता है यही इसका भाव है।
      कई गावों में रावण भाटा मैदान हैं, जहां ईंट गारा से बने स्थायी रावण हैं। जो जलकर भी नहीं जलते, मरकर भी नहीं मरते। हर वर्ष दशहरे पर उसे रंगों-रोगन से नया कर लेते हैं। अर्थ यह कि रावण उर्फ दशानन अमर है।
    दशहरा नाम सिद्ध करता है कि राम रावण के ही कारण जिन्दा है। दशानन न होता तो राम न होता। यथार्थ में भी दशानन के कारण ही राम ने जन्म लिया था। दशानन वध के बाद क्या रावण मरा? उत्तर है नहीं।
    रावण को वर था कि उसका सिर कटकर फिर जुड़ जाएगा। यह वर अमर है। इसका प्रमाण है प्रजानन।
    प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। प्रजानन का मोटा अर्थ है नेता, और साफ मतलब है प्रधानमन्त्री, मन्त्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि-आदि। ये सब प्रजानन हैं। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें।
    प्रजाननों के अधिकार में दस नहीं अनेक आनन हैं। प्रधानमन्त्री ऊंगली की नोक पर मन्त्री बदल सकता है, सचिव बदल सकता है, दशानन के आनन नियत थे। प्रजानन के आनन परिवर्तनशील हैं। हां प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी भी बदल सकता है, अपना आनन भी बदल सकता है। दशानन से कितना खतरनाक, भयानक है प्रजातन्त्र की उपज प्रजानन।
    दशानन के पास मायावी शक्तियां थीं। वह आकाश में उड़ सकता था, अनेक रूप धर सकता था, आकाश काला कर दे सकता था। प्रजाननों के पास रावण से अधिक मायावी शक्तियां हैं।
    अमेरिकी राष्ट्रपति महान प्रजानन के पास कोड शब्द हैं जिन्हें दबाते ही दनदनाते परमाणु अस्त्र पूरे विश्व को काला कर दे सकते हैं, भून दे सकते हैं। सारी दुनियां को एक बार नहीं कई-कई बार मानव जाति से रहित किया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह सम्भव है।
    सामान्य प्रजानन भी कम नहीं है। हर राष्ट्र के प्रधानमन्त्री वे प्रजानन हैं जिनके पास अपार शक्ति है, दशानन से कहीं अधिक। एक घोडे़ पर सवार व्यक्ति छ पावों का मालिक होता है। दशानन बीस पगों की शक्ति रखता था। ये प्रजानन शत-शत अश्वशक्ति युक्त विमानों के पगों वाले हैं। इनके हजारों पांव हैं, हजारों गतियां हैं।
    दशानन काल में प्रजातन्त्र नहीं था। प्रजतन्त्र का अधकचरा रूप था। प्रज = व्यक्ति। व्यक्ति  आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह स्वयं स्व-शक्ति रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। जितनी मंहगी सुरक्षा व्यवस्था जहां होती है वहां उतनी ही अव्यवस्था होती है। महान प्रजानन को 2.8 लाख रु. प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। दशानन के बीस हाथ थे, प्रजानन की रक्षा में सोलह रु. दैनिक वेतन पानेवाले हाथ यदि लगें तो पैंतीस हजार हाथ लगे हैं। एक रावण जो उस समय योग्यतम राजनीतिज्ञ, शक्तिशाली, वेद-ज्ञाता विद्वान था वह मात्र स्वयं रक्षित था। आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।
    दशानन अपने सभासदों से घिरा निकलता था, तो वह तारों में सूर्य, हाथियों में सिंह के समान प्रतीत होता था। और आज का प्रजानन ब्रिटेन के अलिखित संविधान जो समस्त संविधानों की डालडा जननी है के अनुसार ”मेहराब का मुख्य पत्थर, तारों में चन्द्रमा“ आदि है; जब कमाण्डों से घिरा, सादे वेशधारी जासूसों से घिरा निकलता है तो ऐसा लगता है मानों हाथियों से घिरा चूहा हो।
    प्रजातन्त्र व्यवस्था में चूहा मत बटोर ले तो मुकुट का अधिकारी हो जाता है। कुत्ता मत बटोर ले तो वह राजसिंहासन पर बैठ जाता है। पर क्या मुकुट पहनने से, राजसिंहासन बैठने से इनकी आदतें कुतरनें, जूता काटने की छूटती हैं?
    प्रजातन्त्र व्यवस्था में चूहे को कुत्ते को हजारों पांव, हजारों हाथ, हजारों सिर दे दिए जाते हैं वह प्रजानन हो जाता है। और कालान्तर में इन हाथों का यदि वह पांच प्रतिशत भी प्रयोग कर लेता है तो उसे कुछ बौने प्रजानन देशरत्न, देशसपूत की उपाधियां दे दिया करते हैं।
        आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों मंे, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है।
    मैं रावण राज्य में नहीं रहा हूं। मैं नहीं जानता वहां क्या होता था। पर इतना सब जानते हैं कि उसकी पूरी लंका सोने की थी। मैं यह जानता हूं कि प्रजाननों कि प्रजातन्त्र व्यवस्था में आम आदमी का ईमानदारी पूर्वक जीना दूभर है। यहां योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा, सत्यवादिता की कोई कदर नहीं। संविधान ही   संविधान के साथ खिलवाड़ कर रहा है।
पढ़ा था कभी एक शेर सरल सा
पहले दूध से घी बनता था,
अब वनस्पति से घी बनता है।
पहले जननी जनती थी,
अब सारा आलम जनता है।
    प्रजातन्त्र से पूर्व जननी महान पुरुषों का निर्माण करती थी। बच्चों में बचपन से गुण भर-भर कर उन्हं महान व्यक्तित्त्व देती थी। प्रसिद्ध था ”माता निर्माता भवति“। आज प्रजातन्त्र है। प्रजा जनती है। प्रजा की कोख जिसे चाहे उसे नेता गढ़ दे। प्रजानन बना दे, और प्रजानन बनते ही सब बदल जाए।
    आम आदमी की तरह रात सोए सुबह दरवाजे बुलेटप्रुफ कारें खड़ीं हो जाएं साथ कमाण्डो का एक दस्ता। एक रात और आम आदमी प्रजातन्त्र ने दीवारों से घेर दिया, प्रजानन बना दिया, उसकी दुनियां बदल गई।
    संविधान व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करता है। गरिमा का अर्थ क्षमता द्वारा प्राप्त ऊंचाइयां होता है। ऐसे व्यक्ति चीफ इंजीनियर, महाप्रबन्धक, प्रबन्धनिदेशक आदि हैं। बहुत पढ़े लिखे डॉक्टर, पी.एच.डी., डी.लिट् आदि उच्च शिक्षित भी गरिमापूर्ण व्यक्ति हैं। इनमें सभी के सभी प्रजाननों से दुर्लभ हैं। इनके समकक्ष भारत में इने गिने हैं... हजार, दो हजार या ज्यादा से ज्यादा लाख। पर प्रजानन मूल योग्यतामय तो पैंतीस करोड़ हैं और संविधान गरिमा को सुनिश्चित करता है। प्रजाननों से इन्हें स्थल-स्थल अपमानित करवाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता है।
    ऊंचाइयों के क्रम में लें तो चेयरमेन का पद सर्वाधिक योग्यता तथा अनुभव युक्त व्यक्ति द्वारा भरा जाता है। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ हैं अतः यहां अधिकार अधिक हैं। फिर क्रमशः प्रबन्धनिदेशक, अधिकारी निदेशक आदि पदों से चपरासी पद तक योग्यता का अवमूल्यन हो जाता है। चपरासी के पद हेतु करोड़ों योग्य होते हैैं अतः वह पद कम महत्वपूर्ण है।
    चपरासी से भी कम योग्यता का पद है प्रजानन पद या एम.एल.ए., एम.पी.,       प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति पद पर उसमें अधिकार आकाश भर दिए जाते हैं। परिणामतः प्रजानन दशानन के भी विकृत रूप हो गए हैं। जिससे विश्व मानवता कराह रही है।
    योग्यता का व्यक्तिगत श्रम से सीधा सम्बन्ध है। योग्यता महनत द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी प्राप्त की जाती है। और योग्यता दो व्यक्तियों में द्विगुणित या युजित नहीं होती। एम.ए. की कक्षा को पढ़ाने के लिए पी.एच.डी. न मिलने पर हम दो चार बी.ए रखकर काम नहीं चला सकते चाहे कितनें भी लोग इस पक्ष में मत दे दें। छै अरब मत मिलकर भी एक बी.ए. को एम.ए. नहीं बना सकते। यही एम.ए. की गरिमा है कि बी.ए स्व महनत से ही एम.ए. हो सकता है।
    पर प्रजातन्त्र व्यवस्था में मताधीशों को मत पाते ही उनसे ज्यादा शिक्षित डॉक्टरों, इन्जीनियरों, वकीलों, शिक्षाविदों के कानों में विभिन्न सम्मेलनों में अज्ञान थूकने का अधिकार मिल जाता है। न केवल इतना वरन इनके विषय में नीतियां बनाने का भी अधिकार मिल जाता है। कितनी घातक है यह प्रजानन व्यवस्था।
    घुड़सवारों की भीड़ में पैदल हमेशा कुचला जाता है, मारा जाता है। प्रजातन्त्र व्यवस्था ने साम्प्रदायिकों के, धूर्तों के, मठाधीशों के, जातियों के भाषाओं के, दलों के निहित स्वार्थों के आधार पर बने दबाव समूहों को मान्यता दे-दे कर देशों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। विश्व पहले ही देश टुकड़े-टुकड़े था। अब यह और देशों में विभाजित हो रहा है, तथा देश और टुकड़ों में विभाजित हो रहे हैं। इन विभाजन समूहों की भीड़ में पैदल योग्यताएं भरपूर मारी जा रही हैं। छोटे प्रजानन पैदा हो रहे हैं। इन छोटे प्रजाननों को बड़े प्रजानन सहर्ष मान्यता दे रहे हैं।
    इस समस्या का कोई निदान है? एक दशानन का एक राम ने वध किया था। आज इतने प्रजानन गली, कूचे, शहर, नगर में फैले हुए हैं। इनका वध करने, इनके पदों को मिटाने सैकड़ों हजारों राम लगेंगे। हमें, तुम्हें, इन्हें, उन्हें वह राम बनना होगा जो प्रजातन्त्र की हत्या कर सके।
    प्रजातन्त्र हत्या, प्रजानन समाप्ति के बाद का विकल्प है ‘प्रति-जन-तन्त्र’ या ‘प्रज-तन्त्र’ या ‘स्व-तन्त्र’। यह व्यवस्था पैदल आधारित होगी। हर पैदल को योग्यता तथा अनुभव के आधार पर ही    अधिकारों तथा कार्यक्षेत्रों का विवरण किया जाएगा। योग्यता प्राप्ति के अवसर सभी के लिए निःशुल्क तथा समान होंगे।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
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"प्रज बनाम प्रजातन्त्र"

    भीड़ पैदल को कुचलती है। भीड़ है प्रजा, व्यक्ति है पैदल। प्रजा का मस्तिष्क हमेशा उससे आगे बढ़े पैदल से कम होता है। प्रजा और प्रज के टकराव से इतिहास बनता है। भीड़ से अधिक विकसित व्यक्ति की संज्ञा है प्रज। भीड़ अन्धी होती है। अरविन्द ने कहा था-”राज्य भावना (भीड़ भावना या प्रजातन्त्र भावना) या एक छोटी या बड़ी सजीव मशीन और व्यक्ति भावना अधिकाधिक विशिष्ट प्रकाश युक्त और देवत्व की ओर बढ़ता हुआ पुरुष नित्य खड़े हो जाते हैं।“
    निरंकुश शासक का सब पर अत्याचार एक ही पहलू के दो रूप हैं। इतिहास गवाह है कि भीड़ ने पैदल को कुचला है। अरस्तु ने कहा था ”अन्धों में एनेक्सगोरस ही देखनेवाला था।“ पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में 500 ई.पू. एनेक्सगोरस एथेन्स में रहता था। उस समय एथेन्स की प्रजा सूर्य और चन्द्रमा में अगाध भक्तिभाव रखती थी। एनेक्सगोरस के स्वतन्त्र विचार थे। वह प्रज था। उसने कहा ”सूर्य जलता हुआ पत्थर है और चन्द्रमा मिट्टी  का बना हुआ है।“ एनेक्सगोरस पर देव निन्दा का आरोप लगाया गया। वह दोषी ठहराया गया। उसे मृत्युदण्ड सुनाया गया। उस समय एथेन्स में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र था, जो प्रजातन्त्र का सर्वश्रेष्ठ रूप है। उस समय के एक लेखक ने कहा है ”एथेन्स के लोग अपने घरों में अति चतुर किन्तु सामूहिक निर्णयों में अति बुद्धिहीन थे।
    सुकरात 399 ई.पू. में 70 वर्ष का था। वह उन्मुक्त-चर्चा (शास्त्रार्थ) का मसीहा था। तर्क सम्राट अपनी आन्तरिक आवाज से शक्ति प्राप्त करता था। 70 वर्ष की उम्र में 501 एथेन्सवासियों की अदालत ने उस पर आरोप लगाया कि 1.वह राष्ट्र के देवताओं को नहीं मानता। 2.वह नए देवता मानता है। 3.वह एथेन्स के युवकों का चरित्र बिगाड़ रहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि उसे मृत्युदण्ड दिया जाए। सुकरात ने सफाई दी। प्रजा ने कहा ”वह मृत्यु से बच सकता है, इस शर्त पर कि वह एथेन्स छोड़ दे या ज़ुबान बन्द रखे। प्रज सुकरात ने दोनों शर्ते न मानीं। जनता ने बहुमत से उसे विषपान मृत्युदण्ड दिया। सुकरात ने विष पी लिया। अपने जीवन के समान शानदार मृत्यु जी ली। आज वह प्रजा नहीं है सुकरात जिन्दा है।
    सुकरात के भक्त प्लेटो की पाठशाला के मस्तिष्क ‘अरस्तू’ पर एक पुरोहित ने प्रार्थना ओर बलिदान को निष्फल बताने का आरोप लगाया। अरस्तू को एथेन्स से निकाल दिया गया।प्रजा उच्चतर सत्य कभी भी स्वीकार नहीं करती है। प्रजा अधिकतर सच में विश्वास रखती है। प्रजा की दृष्टि पीछे की ओर होती है। प्रज की दृष्टि आगे की ओर होती है। यही कारण है कि प्रज को प्रजा बीत जाने के बाद मान्यता देती है। प्रजा उच्चतर सत्य कभी भी सहजतः स्वीकार नहीं करती।
    ब्रूनो ने पृथ्वी, सूर्य, तारों के विषय में प्रजा से आगे का दृष्टिकोण अपनाया। उसने कहा ”हमारी पृथ्वी की तरह असंख्य तारों पर प्राणी बसते हैं।“ ब्रूनों को अपने विचारों के कारण जीवित ही अग्नि में जला दिया गया। जब उसे यह दण्ड पढ़कर सुनाया गया तो उसने न्यायाधीशों से कहा ”मुझे तुम्हारा निर्णय सुनते हुए इतना भय नहीं लगता जितना तुम्हें सुनाते हुए होता है।“
    जो ब्रूनों के साथ हुआ वही टामस हाब्स के जीवन के साथ हुआ। दार्शनिकों में जितने    विरोध हाब्स को सहने पड़े उतने किसी और को नहीं सहने पड़े। जब वह 78 वर्ष का था तो उसकी पुस्तक ‘लेवायथन’ अर्थात् ‘धार्मिक और नागरिक राष्ट्रमण्डल की सामग्री, आकृति तथा शक्ति’ को चर्चने धर्म विरुद्ध ठहराया। लोकसभा में 1666 में पुस्तक की निन्दा की गई और बिल पेश किया गया कि हाब्स को नास्तिकता और धर्मविरोधी भाषा के प्रयोग के लिए दण्ड दिया गया।ब्रूनों के विचार की पुष्टि में गैलीलियो ने दूरबीन बनाई, और उसे जेल में सड़ना पड़ा। इसी कारण दार्शनिक डेकार्ट अपने भौतिक विज्ञान सम्बन्धी विचारों को प्रकाशित न कर सका। डेकार्ट ने ”मैं चिन्तन करता हूं अतः मैं हूं“ यह प्रमाण दिया था बैरुश स्पिनोजा ने इतना पढ़ा कि पढ़ाई से आगे निकल गया। उसने डेकार्ट की मर्यादा प्रतिबद्धता (भय) पर प्रतिकार किया। उसकी विचार मौलिकता से यहूदी पुरोहित-मण्डल और भीड़ सहम गए। उसे मण्डलाधीशों ने जाति बहिष्कार के शब्द सुनाए तथा प्रसारित किए। उसका अन्तिम अंश इस प्रकार का है... ”इस आदेश द्वारा सब यहूदियों को निर्देश दिया जाता है कि कोई भी उसके साथ न बोले, न उससे पत्र व्यवहार करे। कोई भी उसकी सहायता न करे, न कोई उसके साथ एक मकान में रहे। कोई भी चार हाथों से कम उसके निकट न आए, और कोई भी उसके लेख को जो उसने लिखवाया हो न पढ़े।“
    स्पिनोजा का जीवन भीड़ से एक महान संघर्ष था। ‘यहूदी’ बहिष्कृत जाति थी। वह उससे भी बहिष्कृत था। उसके पिता ने उसे अस्विकार कर दिया। पिता मृत्यु पर पिता सम्पत्ति पर कानूनी हक अदालत से पाकर भी उसने बहन की लालच भावना के कारण वह सम्पत्ति बहन को दे दी। किसी से मदद न ली। उसके हाथ लौकिक कार्य ताला बनाने में तथा मस्तिष्क चेतना के असंख्य रूपों में प्रमुख रूप से जुड़ा रहा। उसकी पुस्तकें उसके मृत्यु पश्चात प्रकाशित हुईं। एक तंग कोठरी में उसने विश्व से आज़ाद विचार जिए। निर्धन स्पिनोजा आन्तरिक समृद्ध था। 44 वर्ष की ही आयु में उसका देहान्त हो गया।
    इमॅन्युएल काण्ट की पुस्तक ”स्वाभाविक धर्म“ तत्कालीन भीड़ को सहन नहीं हुई और उसने राजा से शिकायत की। राजा ने काण्ट को चेतावनी चत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि उसकी शिक्षा से ईसाइयत को बहुत हानि पहुंची है। और राजा बहुत नाराज है। उसे सम्हलना चाहिए नहीं तो परिणाम भयंकर होंगे। दर्शन की अटारी में एकाकी बैठा काण्ट भयंकर परिणाम की ओर न बढ़ा। भीड़ ने विश्व को धर्मचिन्तन से वंचित कर दिया।
    दुनियावी भीड़ के कारण शॉपेनहॉवर ने अपना जीवन एकाकी ही जिया। उसकी पत्नी उसकी सादगी के कारण उसे एकाकी छोड़ गई। उसकी मां ने उसे लिखा ”तुम असह्य हो मत जाना। उसकी पांच वर्ष की मेहनत करके लिखी गई पुस्तक रद्दी में बेच दी गई उसने इसके पूर्व प्रकाशक को लिखा ”जब कोई पुरुष बड़ी पुस्तक लिखता है तो  जनता के स्वागत और आलोचकों की प्रतिकूल आलोचना की उतनी ही परवाह करता है जितनी कि स्वस्थ चित्त मनुष्य पागलों के वचनों की।“ जाहिर भीड़ से कटे शॉपेनहॉवर का अकेला बन्धु सफेद कुत्ता था जिसे वह आत्मा कहता था। किसी विश्व विद्यालय में उसके लिए स्थान न था। रक्त-सर्द बुढ़ापे में उसे सम्मान मिला, जो उसके लिए रद्दी के समान था।
    बहुत पुरानी नहीं फेड्रिक नीत्शे ने एक पुस्तक लिखी- ‘जरथुस्त के कथन’। इस पुस्तक पर प्रजा की राय का पता इससे लगता है कि पुस्तक की 40 प्रतियां बिकीं 7 भेंट की गईं, स्वीकृत हुई और किसी ने इसकी प्रशंसा न की। इसकी प्रशंसा तब हुई जब जीवन के अन्तिम वर्षों में नीत्शे पागल हो चुका था।
    सिसरो की क्रूर हत्या और दांते विश्व राज्य की श्रेष्ठ कल्पना- ‘द मोनार्चिया’ को चर्च द्वारा जला देना, उसे न पढ़ने योग्य, काली पुस्तकों की सूची में रखना अन्धी प्रजा के अन्य गुनाह हैं।    अन्धी प्रजा नें प्रज को कभी भी नहीं स्वीकारा। पाश्चात्य विश्व में वह धीरे-धीरे कायर लेखकों का समर्थन प्राप्त करती रही। और अन्त में प्रजातन्त्र की स्थापना हुई। इस प्रजातन्त्र में जो भी प्रजानन (नेता जिसका आनन प्रजा का है) प्रजा स्वीकृत हुए हैं- वे औसत योग्यता से भी निम्न स्तरीय, किसी तरह की घिसी पिटी नीतियों की लकीर पीटते, मात्र फटाका बातें करते, अत्यधिक लादे गए अधिकारों से युक्त, वास्तविक कार्य और अधिकार अनुपात प्रतिशत क्षमता में सामान्य श्रमिक से भी निम्न, घोर  सुविधाभोगी और चकाचौंधों से जनता को प्रभावित करते इतिहास पुरुष, इतिहास-रत्न बनते हैं।
    प्रजातन्त्र इतनी घातक व्यवस्था है कि यह प्रज (प्रजा से अधिक योग्यों को) पनपने ही नहीं देती है। इसे आज प्रजतन्त्र से विस्थापित करना ही होगा। प्रजतन्त्र वह व्यवस्था है जो संविधान से शासन तक प्रज या व्यक्ति आधारित है। जिसकी ओर स्व-तन्त्र, स्व-आधीन, स्व-स्थ, स्व-अस्ति, स्व-त्व, स्व-सम आदि प्रत्यय इंगन कर रहे हैं। इसकी तुलना में प्रजातन्त्र सर के बल खड़ी व्यवस्था है। एनेक्सगोरस, सुकरात, अरस्तु, ब्रूनो, हाब्स, स्पनोजा, इमॅन्युएल काण्ट, शॉपेनहावर, नीत्शे, सिसरो, दांते भद्र पुरुष थे स्व-तन्त्र थे, स्वाधीन थे, स्व-यम (स्व नियम नियमित) थे।
    आधुनिक प्रजातन्त्र के स्वातन्त्र्य अधिकार मात्र तीन पंक्तियों के हैं। और उन पर प्रतिबन्ध छत्तीस पंक्तियों के हैं। बाएं हाथ की छीनी ऊंगली से दिए गए स्व-अधिकार दोनों हाथों के प्रजा       अधिकारों द्वारा बुरी तरह नोच दिए गए हैं।
    भारतीय संविधान की धारा 19 का मूल अस्तित्व लहूलुहान है। इसमें ‘स्व’ की तन्त्रता, अधीनता अस्तित्वता, नियमन का आधार स्व न मानकर प्रजा माना गया है। संविधान-वर्तमान विधि के खिलाफ,  संविधान के खिलाफ, लोक व्यवस्था के खिलाफ, इनसे अधिक स्वस्थ आचरण, इनसे उच्च चिन्तन की भी इजाजत नहीं देता। यदि कानून ही भ्रष्ट हो तो उसे तोड़ने का सबको हक है। हक ही नहीं उसे नष्ट करना सबका प्रथम कर्तव्य है। भीड़ द्वारा मारे गए प्रजों-महान चिन्तकों नेें यही कर्तव्य पालन किया था, जो उस समय गुनाह था। उफ! यह आज भी गुनाह है।
    सारे महान चिन्तक उस समय के कानूनों से महान थे। क्यों कि वे तटस्थ थे, अन्धे नहीं थे। अर्थात् विशिष्ट टोपीधारी नहीं थे। उनके सिर टोपियों से बड़े थे। तटस्थता बुद्धि की आत्मा है। आज के प्रजातन्त्र में ”बुद्धि की आत्मा“ की हत्या का विधान संविधानों में ही है। प्रजातन्त्र के संविधानों से गुजरकर मात्र तरह-तरह के अन्धे ही उच्चतम पदों पर पहुंच सकते हैं। हर शाख पर उल्लू तो कुछ ठीक ही व्यवस्था है। क्यों कि उल्लुओं को तो रात में तो दीखता है। यहां तो हर शाख पर       अन्धे उल्लुओं का राज्य है। प्रतिबद्धता किसी भी पार्टी के प्रति हो, शुद्ध अन्धेपन का ही नाम है। कुछ न दिखना भयानक बीमारी है। शुद्ध अन्धापन है, जो अन्धेपन से भी खतरनाक है। शुद्ध अन्धेपन के दबाव समूहों को प्रजातन्त्र मान्यता देता है। प्रजातन्त्र व्यवस्था में जातिगत, पार्टीगत, नगरगत, प्रान्तगत, ग्रामगत, शिकंजों का जो स्वरूप विकसित हुआ है वह धार्मिक शिकंजों से कहीं नीच, कहीं घिनौना, कहीं दमघोंटू है।
    बहुसंख्यक दल व्यवस्था का व्यक्ति पर अत्याचार निरंकुशके व्यक्तियों पर के अत्याचार से कहीं भयानक, कहीं बीभत्स है। निरंकुश शासन में भद्र पैदा होने की संभावना तो रहती है, परन्तु बदल अत्याचार व्यवस्था में प्रज या भद्र या तटस्थ पैदा होने, पनपने की सम्भावनाएं नष्ट कर दी गई है। अरविन्द ने आज के राजनीतिज्ञों जो महान दशानन या प्रजानन (कई वोटों से बने चेहरेवाले) हैं के बारे में कहा है कि ”संसार के किसी भाग के राजनीतिज्ञ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह जाति की आत्मा याउसकी उच्च आकांक्षाओं का प्रतीक नहीं होता। साधारणतया वह अपने चारों ओर की आम तुच्छता, स्वार्थपरता, अहंबुद्धि और आत्मप्रवंचना का ही प्रतिनिधि होता है। इनका प्रतिनिधित्व तो वह भली-भांति करता ही है, साथ ही अत्यधिक मानसिक अयोग्यता, नैतिक रूढ़िता, भीरुता, क्षुद्रता तथा पाखंड का प्रतिनिधित्व भी करता है।“ यह तो प्रजातन्त्र की सबसे श्रेष्ठ, सम्भ्रान्त, सर्वाधिकार-सम्पन्न फसल है। इस राजनीतिज्ञ के विषय में आगे कहा है कि ”उच्च शब्द और उत्तम विचार उसके मुख पर होते हैं। पर वे शीघ्र ही पार्टी के विज्ञापन की चीज बन जाते हैं। वर्तमान राजनीतिज्ञ जीवन में असत्याचरण का यह रोग संसार के प्रत्येक देश में दृष्टिगोचर हो रहा है, और सब लोग यहां तक कि बुद्धिजीवी वर्ग भी मन्त्रमुग्ध होकर उस बढ़े संगठित स्वांग में सहमत और सहभागी हो जाते हैं। उससे रोग ढंक जाता है, तथा लम्बे समय तक चलता रहता है।“
    इस आलेख द्वारा आह्नान है उन महान बुद्धिजीवीयों का जो इस स्वांग के सहभागी नहीं हैं। वे अपने-अपने क्षेत्र प्रजातन्त्र हत्या महान प्रयास से करें। वर्तमान एवं भविष्य उनका आभारी होगा।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (छत्तीसगढ़) ; (0788) 2392884

Wednesday, September 15, 2010

"आर्थिक सुरक्षा एवं प्रजातंत्र"

"ऋणं कृत्वा घृतं पीत्वा" चार्वाक वाक्य था |
"ऋणं कृत्वा मात्र जीत्वा" प्रजातंत्र वाक्य है |
गृह ऋण, शिक्षा ऋण, खेती ऋण, कार ऋण, स्कूटर ऋण, मोबाइल ऋण प्रजातंत्र का नाम हि ऋण है | हर व्यक्ति यहाँ ऋणी है | ऋणधारियों  के चित्रों से यहाँ पन्नों के पन्ने भरे रहते हैं | लाखों परिवार बर्बाद हैं | इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक अपना आधे से अधिक वेतन ऋण पटाने में व्यय करते हैं, ऊँचे मकानों में रहते हैं, कार चलते हैं, मोबाइल झूमते हैं और घर में जुच्चा-फुस्सा पकवान खाते हैं | फल खरीदते डरते हैं | इतनी मूर्ख आर्थिक व्यवस्था विश्व में कभी न थी | अभी तो किसानों से शुरुआत हुई यह ऋण-आत्महत्या परंपरा ऊपर वर्ग भी फैलना शुरु हुई है |

"सामाजिक असुरक्षा एवं प्रजातंत्र"

प्रजातंत्र में मानव जितनी सामाजिक असुरक्षा जी रहा है उतनी और किसी युग में नहीं थी | तीन-चार वर्षीय बालिकाओं से लेकर अस्सी वर्षीय नानियों तक के साथ बलात्कार की घटनाएँ, ट्रेन में, कारों में, होटलों में, थानों में, सब के सामने, सडकों पर भी बलात्कार की तथा सरे आम हत्या की घटनाओं से समाचार-पत्र भरे रहते हैं | राजनैतिक हत्याएं, जातिगत हत्याएं, नक्सली अपहरण, फिरौती अपहरण, राज-ठगी, लूट-मार, छीना-झपटी, ये इतने आम हैं की हर सामान्य व्यक्ति के सामने हि घटती हैं | प्रजातंत्र के पेचीदा वाहियात कानूनों, और उससे भी गयी-बीती कानून व्यवस्था जो औसत दर्जे के मूर्ख मतों जीते मूर्खानन (प्रजाननों) द्वारा निर्मित हैं वह चिंदी-चिंदी हैं| इस में सामाजिक सुरक्षा के बीजों के पनपने की गुंजाइश हि नहीं है | इसलिए प्रजातंत्र हत्या बिना सामाजिक सुरक्षा बहाली असंभव सी है |

Tuesday, September 14, 2010

"धर्म और प्रजातंत्र"

 प्रजातंत्र "धर्म" (सम्प्रदाय) को सत्य असत्य की आधार से नहीं अपितु बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की दृष्टी से देखता है, जो मूर्खता पूर्ण दृष्टी है | महात्मा गाँधी, नेहरु आदि भी इस मूर्ख दृष्टी के शिकार थे | यथार्थतः धर्म को विज्ञान की परिभाषाओं की कसौटी पर कसकर मान्य या अमान्य करना उचित दृष्टीकोण है |

प्रजातंत्री चिंतन कहता है की "यदि हम मान भी लें की धर्म में ही अंतिम और अनन्य सत्य निहित है तो भी दूसरों को यह स्वीकार कराने की कीमत इतनी अधिक चुकानी पड़ती है की आज के बहुधर्मी संसार में इसे बिलकुल उचित नहीं ठहराया जा सकता | प्रजातंत्र मानता है की असत्यों, अनर्गल, अंधविश्वासों, मूर्खताओं को समाज में खुला छोड़ दिया जाए और ये विश्व का खुले आम घटियाकरण करते रहें | और विश्व में यह हो भी रहा है | इतनी समझ तो आम आदमी में भी है की विधान में अनर्गल प्रावधान नहीं होने चाहिएं | पर प्रजातंत्र संविधान में ही अनर्गल प्रावधान हैं |


हर धर्म (सम्प्रदाय समेत) को माननेवालों मत की अभिव्यक्ति तथा संगठन की प्रजातंत्री स्वतंत्रता देना प्रजातंत्री राज्य की जिम्मेवारी है | घटिया बढ़िया को बराबर मत अभिव्यक्ति तथा संगठन स्वतंत्रता प्रजा में निरर्थ आघात-प्रघात, गाली-गलौंच पैदा करेगा ही | और यही हो भी रहा है | इस से बढ़िया का अवमूल्यन निश्चित है | इसी कारण से विश्व में बढ़िया का तीव्र अवमूल्यन हो भी रहा है |

"जनता की पसंद, व्यवस्था घटियाकरण और प्रजातंत्र"

"बाजारवाद" जनता आधारित है | बाजार में तरह-तरह की पुस्तकें पत्रिकाएं उपलब्ध हैं | इन पुस्तकों की श्रेष्ठता देखते तटस्थता और निष्पक्षता की कसौटी पर कस कर उनकी सूची बनाई जाए और जनता की पसंदानुसार सूची बनाई जाए तो पता चल जाता है की जनता कितनी समझदार है | यही स्थिति भोजन के बारे में भी है | सारे विकसित, अविकसित संसार में खाने के मामले में प्रजातंत्र ने लोगों को निगल-निगल खाना खिला स्थूल काय तथा रोगी किया है | "जन-पसंद" बड़ी ही घटिया चीज का नाम है | विश्व इन्टरनेट इसका गवाह है | अंधे महात्मा और उनको पसंद करती जनता इसकी गवाह है | फिल्मों के नग्न और बदन उडाऊ सितारे और इन्हें पसंद करती जनता इस की गवाह है | डॉक्टरों के प्रयास से बचे अमिताभ बच्चन द्वारा बचने के लिए तिरुपति पर नौ करोड़ का वह भी ब्रेसलेट चढाने जैसी महामूर्खता करना, अपनी पत्नी (गृह)  का खाना, पिता की कविताएं, दर्शकों की पसंद, मुंबई की आबोहवा आदि को नूरानी तेल  से पैसों के कारण घटिया बताना और इस के बाद भी जन-पसंद होना, बाहुबलियों, भ्रष्टों का चुनाव जीतना, संसद मीटिंगों का अर्ध चुनावाधारित Institution of Engineers की मीटिंगों से भी घटिया होना, संसद मीटिंगों का हर प्रशासनिक मीटिंगों से भी घटिया होना, बाजार में श्रेष्ठ पत्रिकाओं का चलन बंद होते चले जाना, वह भी प्रजातंत्र के प्रसार के समानुपात में बंद होते चले जाना आदि प्रमाण हैं की जनता कभी बढ़िया नहीं चुन सकती और न जनता में बढ़िया चुनने की क्षमता कभी आ सकती है | और प्रजातंत्री "चुनाव" का आधार जनता है | अतः प्रजातंत्र सीधा व्यवस्था का घटियाकरण है |

"स्वतंत्रता, निष्पक्षता एवं प्रजातंत्र"

क्या पूरी जनता कभी "स्वतंत्र एवं निष्पक्ष" हो सकती है ? "तटस्थता बुद्धि की आत्मा है" तन, इन्द्रिय, मन, बुद्धि ये स्तर हैं | और इन स्तरों के पार है "बुद्धि की आत्मा" जहाँ तटस्थता रहती है | "स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता" विद्वत्ता के उच्च स्तर की संकल्पनाएँ हैं | इन्हें जनता के ६० % अभाव-ग्रस्त, ९५ % मात्र दसवी पढ़ी जनता पर प्रत्यारोपित कर उत्तम परिणाम प्राप्त करने की कल्पना कोई समझदार व्यवस्था कभी नहीं कर सकती है | यह कल्पना प्रजातंत्र ही कर सकता है | इसलिए इस की हत्या आवश्यक है |

"चुनाव पद्धति और प्रजातंत्र"

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की बात प्रजातंत्र करता है | पर संविधान के सारे प्रावधान स्वतन्त्रता घाती एवं पक्षपाती हैं | "पार्टीवाद"  चुनाव का आधार सत्य ही पक्षपाती, दूसरों की स्वतंत्रता हनन करनेवाला, अँधा करनेवाला प्रावधान है | "चुनाव" का मूल उद्देश्य पद की गरिमा, उत्तरदायित्व, उच्चता , अधिकारों की न्यायपूर्वक निर्वहन  हेतु उपयुक्ततम , योग्यतम व्यक्ति चुनना है | इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए हमेशा पद से उच्च स्थिति रखती एक समिति परीक्षा, गहन आकलन, साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा श्रेष्टतम का चुनाव करती है | प्रजातंत्री चुनाव उपरोक्त सटीक चुनाव का कचूमर से भी अधिक चटुमर निकाल देता है | योग्यों द्वारा वैज्ञानिक परीक्षा चुनाव की आत्मगत शर्त है | प्रजातंत्री चुनाव में इस मूल या आत्मगत शर्त को ही नकार दिया है | औसत जनता उच्चतम, श्रेष्ठतम पद हेतु चयन करेगी.. कितना हास्यास्पद प्रावधान है जो "उच्च योग्यताधारी शिक्षित अनुभव-दक्ष" लोगों को पहले ही बहार कर देता है की वे औसत नहीं हैं | जनता की औसत भावना को वैज्ञानिकता, उच्च प्रत्यय समझते ही नहीं हैं | वह श्रेष्ठ आकलन करने की योग्यता ही नहीं रखती है | जनता बेशक "जन-प्रिय" चुनेगी | पर जनता को "जन-प्रिय" वही होगा जो उनकी मान्यताओं को मान्य करेगा | क्या जो स्वयं अंधे हों और अंधी मान्यताओं को जी रहे हों, कभी आँखवाले को अपना नेता चुनेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर एच. जी. वेल्स के उपन्यास "अंधों के देश" (कंट्री ऑफ़ ब्लाइंड्स) में सटीक दिया है | अंधों के देश के डॉक्टर आँखों को दोष बताते उस का ऑपरेशन कर देंगे या उस को पागल करार दे देंगे | प्रजातंत्री व्यवस्था में इतिहास गवाह है नव-चिंतन, श्रेष्ट-चिंतन युक्त लोगों को पागल घोषित कर दिया जाता है | जनता चुनाव पद्धति योग्यता की हत्यारी है और अयोग्यों, अंधों, अंधविश्वासियों, नाटकबाज, धूर्तों के चुने जाने की संभावना से भरी दुर्व्यवस्था का नाम है | इसलिए प्रजातंत्र हत्या जरूरी है |