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Tuesday, September 14, 2010

"धर्म और प्रजातंत्र"

 प्रजातंत्र "धर्म" (सम्प्रदाय) को सत्य असत्य की आधार से नहीं अपितु बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की दृष्टी से देखता है, जो मूर्खता पूर्ण दृष्टी है | महात्मा गाँधी, नेहरु आदि भी इस मूर्ख दृष्टी के शिकार थे | यथार्थतः धर्म को विज्ञान की परिभाषाओं की कसौटी पर कसकर मान्य या अमान्य करना उचित दृष्टीकोण है |

प्रजातंत्री चिंतन कहता है की "यदि हम मान भी लें की धर्म में ही अंतिम और अनन्य सत्य निहित है तो भी दूसरों को यह स्वीकार कराने की कीमत इतनी अधिक चुकानी पड़ती है की आज के बहुधर्मी संसार में इसे बिलकुल उचित नहीं ठहराया जा सकता | प्रजातंत्र मानता है की असत्यों, अनर्गल, अंधविश्वासों, मूर्खताओं को समाज में खुला छोड़ दिया जाए और ये विश्व का खुले आम घटियाकरण करते रहें | और विश्व में यह हो भी रहा है | इतनी समझ तो आम आदमी में भी है की विधान में अनर्गल प्रावधान नहीं होने चाहिएं | पर प्रजातंत्र संविधान में ही अनर्गल प्रावधान हैं |


हर धर्म (सम्प्रदाय समेत) को माननेवालों मत की अभिव्यक्ति तथा संगठन की प्रजातंत्री स्वतंत्रता देना प्रजातंत्री राज्य की जिम्मेवारी है | घटिया बढ़िया को बराबर मत अभिव्यक्ति तथा संगठन स्वतंत्रता प्रजा में निरर्थ आघात-प्रघात, गाली-गलौंच पैदा करेगा ही | और यही हो भी रहा है | इस से बढ़िया का अवमूल्यन निश्चित है | इसी कारण से विश्व में बढ़िया का तीव्र अवमूल्यन हो भी रहा है |