खाऊराम प्रजानन। जो जितना बड़ा प्रजानन होता है वह उतना ही बड़ा महाभोजखाऊ, देशखाऊ, व्यवस्थाखाऊ, सुविधाएंखाऊ, कानूनखाऊ, चंदाखाऊ, गिफ्टपाऊ, अलंकरण (भारतरत्न और न जाने क्या क्या) पाऊ और परिवारतारू होता है। जो ऐसा नहीं होता वह प्रजानन नहीं होता है, अर्थात् वह दाल-भात या दाल-रोटीखाऊ, होता है। प्रजानन महाभोजखाऊ होता है। महाभोज के आयटम होते हैं- भट्टी का मुर्ग, कटहल की बिर्यानी, बादाम का हलुवा, दाल सात सलामा, जन्नते जमीन, दही तड़का, कुल्फी तिरंगा, हुस्ने-आरा बादशाही तुकड़ा, फिरनी फलों का राजा, पनीर खास टिक्का, मुर्ग वाजिद अलिया और कुन्दन कलिया, चौबीस कॅरेट स्वर्ण वर्क सजीया। ये सब खाने विदेशी जाम पीने के बाद प्रजानन को देश की गरीबी भूखमरी बड़ी साफ दिखाई देती है। और उसका गरीबी पे दिया भाषण सर्वाधिक तालियां लूटता है। तुलसीदास स्वयं को दीन बता दीनबन्धु पूजता था। यह सर्वाधिक पेट भरा हो दूसरे की भूख पर तालियां बटोरता है, पैसा कमाता है। महापेटपूजू भूख-बक् होता है। प्रजानन समूह क्या पिस्ता, काजू, किशमिश, बादाम की पेशाब, लॅट्रिन करते हैं कि इन्हें किचन से भी ज्यादा साफ लॅट्रिन बाथरूम चाहिए? चार घण्टे के कहीं प्रवास पर इनके लिए ढाई लाख रुपये का लघुशौचालय बनता है। ऐसे प्रजानन जब गरीबी हटाने की बात कर भारतरत्न हो जाते हैं तो मानवता सोलह-सोलह आंसू रोती है।
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