दशानन कहते हैं रावण को जिसमें बताया जाता है कि दस श्रेष्ठ व्यक्तियों का ज्ञान समाहित था। किन्तु परस्त्री भोगेच्छा के कारण अपने समस्त राक्षस कुल एवं राष्ट्र के लिए घातक-पातक था। नौ लाख वर्षों पूर्व के एक गधा सिर रावण को अपनी भूलों के लिए आज तक भी जलाया जाता आ रहा है। आज प्रजातन्त्र में प्रजाननों का बोलबाला है। येन केन प्रकारेण प्रजा के मतों से जीता लाखों गधासिरों से बना है सिर जिसका और इन गधा सिरों पर एक महाधूर्त सियार सिर सिरमौर है जिसका ऐसा दशानन से कहीं घातक, कहीं पातक एम.एल.ए., एम.पी., उपमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री नामधारी व्यक्ति प्रजानन है। संक्षेप में प्रजा का आनन समाविष्ट है जिसमें वह एक आनन है प्रजानन। एक दशानन घातक था। इतने प्रजानन कितने घातक हैं? आइए थोडा विचार करें। प्रजाननों के अधिकार में दस नहीं अनेक आनन हैं। प्रधानमन्त्री ऊंगली की नोक पर मन्त्री बदल सकता है, सचिव बदल सकता है, दशानन के आनन नियत थे। प्रजानन के आनन परिवर्तनशील हैं। हां प्रधानमन्त्री अपनी पार्टी भी बदल सकता है, अपना आनन भी बदल सकता है। दशानन से कितना खतरनाक, भयानक है प्रजातन्त्र की उपज प्रजानन। अमेरिकी राष्ट्रपति महान प्रजानन के पास कोड शब्द हैं। जिन्हें दबाते ही दनदनाते परमाणु अस्त्र पूरे विश्व को काला कर दे सकते हैं, भून दे सकते हैं। सारी दुनियां को एक बार नहीं कई-कई बार मानव जाति से रहित किया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह सम्भव है।
व्यक्ति आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह अपनी शक्ति के कारण रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों में, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है। आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस से चालीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।
व्यक्ति आधारित व्यवस्था में सर्वाधिक शक्तिशाली, सर्वाधिक योग्यता के कारण रावण राजा था। वह अपनी शक्ति के कारण रक्षित था। आज प्रजातन्त्र है। प्रजानन को दस करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की सुरक्षा चाहिए। आज विश्व के अधिकांश देशों में माताएं सड़कों पर, स्टेशनों पर, गन्दी-गलीच झोपड़ियों में, ट्रेनों में प्रजाननों के जाने के कारण रस्ता रुकावट से कभी-कभी जीपों में शिशुओं को जन्म देती हैं। ये शिशु धूलों में, ट्रेन डिब्वों के कारिडारों में, रेल्वे स्टेशन की बेंचों पर, कीचड़ भरी नालियों किनारे, सड़ते केले छिलकों, उड़ते बीमारी जीवाणुओं, टट्टियों की बदबुओं के मध्य पड़े पलते हैं, मरते हैं। कुछ जीते हैं। और उन देशों के प्रजाननों सजी संसदें इनकी सुरक्षा से बेखबर संसद में भूतपूर्व, वर्तमान प्रजानन सन्तानों की सुरक्षा हेतु संविधान संशोधन पेश करती है। प्रतिप्रजानन रिश्ते जुड़े व्यक्ति की सुरक्षा पर करीब चालीस हज़ार रु. प्रतिदिन व्यय अनुमोदन देती है। आज एक प्रजानन की योग्यता मात्र भारत का नागरिक होना तथा पागल दीवालिया न होना है, जो निम्नतम है। उसकी इतनी सुरक्षा व्यवस्था कि उसे पैंतीस हजार हाथ रक्षित करें, जब कि इस पद के योग्य भारत में पैंतीस से चालीस करोड़ व्यक्ति सहज उपलब्ध हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है।
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