Wednesday, September 15, 2010

"सामाजिक असुरक्षा एवं प्रजातंत्र"

प्रजातंत्र में मानव जितनी सामाजिक असुरक्षा जी रहा है उतनी और किसी युग में नहीं थी | तीन-चार वर्षीय बालिकाओं से लेकर अस्सी वर्षीय नानियों तक के साथ बलात्कार की घटनाएँ, ट्रेन में, कारों में, होटलों में, थानों में, सब के सामने, सडकों पर भी बलात्कार की तथा सरे आम हत्या की घटनाओं से समाचार-पत्र भरे रहते हैं | राजनैतिक हत्याएं, जातिगत हत्याएं, नक्सली अपहरण, फिरौती अपहरण, राज-ठगी, लूट-मार, छीना-झपटी, ये इतने आम हैं की हर सामान्य व्यक्ति के सामने हि घटती हैं | प्रजातंत्र के पेचीदा वाहियात कानूनों, और उससे भी गयी-बीती कानून व्यवस्था जो औसत दर्जे के मूर्ख मतों जीते मूर्खानन (प्रजाननों) द्वारा निर्मित हैं वह चिंदी-चिंदी हैं| इस में सामाजिक सुरक्षा के बीजों के पनपने की गुंजाइश हि नहीं है | इसलिए प्रजातंत्र हत्या बिना सामाजिक सुरक्षा बहाली असंभव सी है |

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