शतरंज निठल्लों का खेल है। राजनीति भी निठल्लों का खेल है। शतरंज और राजनीति में जो डूबा सो ऐसा डूबा कि कभी भी उबर नहीं सका। शतरंज के खिलाड़ियों को न युद्ध की परवाह होती है, न बाढ़ की न घर की। उनका सारा ध्यान चौसठ खानों तथा पैदल, हाथी, घोड़े, ऊंट और वज़ीर पर सिमटा रहता है, जो दुबके राजा को बचाने का प्रयास करते रहते हैं।
राजनीति के भी खिलाड़ियों को न घर की परवाह होती है, न बाहर की। उनका सारा ध्यान चौसठ मन्त्री पदों पर लगा रहता है। जिसके लिए वे कभी पैदल, कभी हाथी, कभी ऊंट का रोल अदा करते रहते हैं। शतरंज और राजनीति दोनों ही मारकाट के खेल हैं। खेल बोर्ड में या देश में होता है, लेकिन दोनों पक्षों के दिमाग में मारकाट की भयानक साजिश चलती रहती है।
राजातन्त्र का शतरंज युद्ध और प्रजातन्त्र का शतरंज युद्ध एक दूसरे के सर को बल खड़ा पाते हैं। राजातन्त्र शतरंज पुराने नियमों पर आधारित था। जिसमें यदि कोई मुहरा दूसरे के जोर पर है तो उसे नहीं मारा जा सकता, चाहे वह पैदल का ही क्यों न हो। परिणामतः पैदल के जोर पर वज़ीर, घाड़े, हाथी, ऊंट आगे रहते थे तथा उनके मरने के बाद पैदल मरते थे। राजा, सेनापति युद्ध के सहभागी होते थे, अग्रिम मोर्चा संभालते थे। सारे वार उन्हें झेलने पड़ते थे। प्रायः वे ही पहले मरते थे।
प्रजातन्त्र शतरंज में पैदल दो-दो घर चल सकता है। वह आगे रहता है। मरने मारने का जोर से कोई सम्बन्ध नहीं, जो जिसे चाहे जोर-बेजोर मार सकता है। इस युद्ध व्यवस्था में सेनापति, राजा युद्धक्षेत्र जाते भी नहीं हैं, सुदूर प्रचालन से पैदलों सैनिकों को लड़ाते हैं। मरते पैदल हैं।
अंग्रेजों ने भारत बोर्ड पर जो शतरंज खेला उसमें सफेद-काले मुहरे हिन्दू- मुसलमान थे, जो ज्यादा करके पैदल थे। अंग्रेजों के हाथी, घोड़े आदि पैदलों को आखरी खाने में पहुंचने से रोकते रहे, कहीं वे वज़ीर न बन जाएं। अंग्रेज शतरंज-खेल खेलकर चले गए और गोरे अंग्रेज गोरे कपड़ों वालों को शासन दे गए। गोरे कपड़ों वालों नें सारी शतरंज अंग्रेजों से ही सीखी थी। इनके सिरमौर वहीं खेलें खाए थे। वे लार्ड मैकाले और मैकियाविली के प्रिंस थे। इन्होंने देश में नई शतरंज पैदा की। भाषाई पैदल बनाए, साम्प्रदायिक पैदल बनाए। हिन्दुओं में भी, मुसलमानों में भी सफेद-काले मुहरे बनाए। और कई बार तो काल्पनिक रेखाओं से बंटे घर के टुकड़ों से भी हाथी, घोड़ा, ऊंट बनाकर शतरंज खेला। पैदलों को आगे कर-कर के कुचला। इतना कुचला कि आज हर पैदल कराह रहा है हर पैदल घायल है। तब बादशाहों को शतरंज का कभी कदा शौक चर्राता था, तो वे अपने बत्तीस सैनिक चुन लेते थे। चौसठ खानों का बड़ा मैदान बना लेते थे। दोनों अटारियों पर रानियों समेत वे काले सफेद वेशभूषाधारी पैदल, हाथी, घोड़ा, ऊंट सैनिकों को खानों में हर चाल पर वास्तव में जाने को निर्देश देते थे। सैनिकों को उनकी आज्ञाओं पर मरना पड़ता था। दो राजा कम बत्तीस याने तीस सैनिक एक खेल में मारे जाते थे। आज जब प्रजानन, राजनेता, पक्ष-विपक्षी शतरंज खेलते हैं तो कभी मण्डल, कभी कमण्डल, कभी अण्डल, कभी बण्डल, कहीं पंजाब, कहीं आसाम, कहीं कश्मीर में रोज काले-सफेद पैदल मारे जाते हैं ये घिनौना शतरंज फौरन बन्द होना चाहिए। जनता भले ही आठ पैदलीय शतरंजी पैदल हो; बुद्धिजीवी न तो पैदल बने, न इस व्यवस्था के हाथी, घोड़े, ऊंट ही बने।
शतरंज की हार सबसे बुरी हार होती है। जुए से भी बुरी हार। हारनेवाले की आत्मा तक गहरी उतर जाती है। एक बार मैं अन्ध विद्यालय के एक बच्चे से शतरंज में हार गया था। वह अन्धा बच्चा मेरी तुलना में शतरंज बोर्ड तथा मोहरों की स्थिति अधिक देख सकता था। उसकी ऊंगलियों में आंखें थीं। फैली हथेलियां हर मोहरे की स्थिति पकड़ लेती थीं। उसके दिमाग का शब्द चित्र महान था। मैं अपने कालेज का श्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ी हार गया था। वह गौरवमय हार थी। पर आज तक वह हार साए के समान मेरे साथ है। उस अन्धे चौदह वर्षीय शतरंज के खिलाड़ी में विश्व चॅम्पियन बनने की सम्भावनाएं थीं। पर व्यवस्था उससे ज्यादा अन्धी थी इसलिए उसे न देख सकी। खैर शतरंज की हार कभी नहीं भूलती।
राजनीति की हार भी कभी नहीं भूलती। हारा राजनीतिज्ञ आत्मा तक हिल जाता है। दुबारा लड़ता है। धरतीपकड़ नाम का एक उत्तम व्यक्तित्व अभी सत्रह स्थानों से लड़ा है। उस पर कई हारों का काला नशा है। उसे अभी तक समझ नहीं आई राजनैतिक शतरंज की। उसनें जनता को काला, गोरा, लाल, सफेद नहीं बांटा। जिसने पैदल मारनेवाले हाथी, घोड़े, ऊंट नहीं रचे वो भला प्रजातन्त्र शतरंज में क्या जीतेगा? उसे उम्रभर हारना है। उम्रभर चुनाव लड़ना है क्योंकि हार उसकी आत्मा तक पहुंच चुकी है। प्रजातन्त्र शतरंज में अरे बुद्धिजीवियों! तुम सब धरतीपकड़ हो। सर्वाधिक धरतीपकड़ कीड़े, मकोड़े, चींटी, दीमक आदि होते हैं। तुम्हारी हस्ती ही क्या है? पांच लाख मतों में चार-पांचसौ वोटों की। हा! अपने पे किसान, दीप, पंजे, कमल आदि का दाग लगवा लो तो हस्ती बढ़ जाएगी। चरवाह जानवरों को पहचाान के लिए दागता है। प्रजातन्त्र यही दगनी व्यवस्था है। दागित मत हो! मेरा आह्नान है गलत व्यवस्था के गलत आकलन से स्वयं को कम मत समझो। व्यवस्था तोड़ बनो। सुकरात, ब्रूनो, स्पिनोजा, गैलीलियो, दयानन्द बनो। राजनैतिक शतरंज की घिनौनी बिसात उलट दो।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (छत्तीसगढ़)
राजनीति के भी खिलाड़ियों को न घर की परवाह होती है, न बाहर की। उनका सारा ध्यान चौसठ मन्त्री पदों पर लगा रहता है। जिसके लिए वे कभी पैदल, कभी हाथी, कभी ऊंट का रोल अदा करते रहते हैं। शतरंज और राजनीति दोनों ही मारकाट के खेल हैं। खेल बोर्ड में या देश में होता है, लेकिन दोनों पक्षों के दिमाग में मारकाट की भयानक साजिश चलती रहती है।
राजातन्त्र का शतरंज युद्ध और प्रजातन्त्र का शतरंज युद्ध एक दूसरे के सर को बल खड़ा पाते हैं। राजातन्त्र शतरंज पुराने नियमों पर आधारित था। जिसमें यदि कोई मुहरा दूसरे के जोर पर है तो उसे नहीं मारा जा सकता, चाहे वह पैदल का ही क्यों न हो। परिणामतः पैदल के जोर पर वज़ीर, घाड़े, हाथी, ऊंट आगे रहते थे तथा उनके मरने के बाद पैदल मरते थे। राजा, सेनापति युद्ध के सहभागी होते थे, अग्रिम मोर्चा संभालते थे। सारे वार उन्हें झेलने पड़ते थे। प्रायः वे ही पहले मरते थे।
प्रजातन्त्र शतरंज में पैदल दो-दो घर चल सकता है। वह आगे रहता है। मरने मारने का जोर से कोई सम्बन्ध नहीं, जो जिसे चाहे जोर-बेजोर मार सकता है। इस युद्ध व्यवस्था में सेनापति, राजा युद्धक्षेत्र जाते भी नहीं हैं, सुदूर प्रचालन से पैदलों सैनिकों को लड़ाते हैं। मरते पैदल हैं।
अंग्रेजों ने भारत बोर्ड पर जो शतरंज खेला उसमें सफेद-काले मुहरे हिन्दू- मुसलमान थे, जो ज्यादा करके पैदल थे। अंग्रेजों के हाथी, घोड़े आदि पैदलों को आखरी खाने में पहुंचने से रोकते रहे, कहीं वे वज़ीर न बन जाएं। अंग्रेज शतरंज-खेल खेलकर चले गए और गोरे अंग्रेज गोरे कपड़ों वालों को शासन दे गए। गोरे कपड़ों वालों नें सारी शतरंज अंग्रेजों से ही सीखी थी। इनके सिरमौर वहीं खेलें खाए थे। वे लार्ड मैकाले और मैकियाविली के प्रिंस थे। इन्होंने देश में नई शतरंज पैदा की। भाषाई पैदल बनाए, साम्प्रदायिक पैदल बनाए। हिन्दुओं में भी, मुसलमानों में भी सफेद-काले मुहरे बनाए। और कई बार तो काल्पनिक रेखाओं से बंटे घर के टुकड़ों से भी हाथी, घोड़ा, ऊंट बनाकर शतरंज खेला। पैदलों को आगे कर-कर के कुचला। इतना कुचला कि आज हर पैदल कराह रहा है हर पैदल घायल है। तब बादशाहों को शतरंज का कभी कदा शौक चर्राता था, तो वे अपने बत्तीस सैनिक चुन लेते थे। चौसठ खानों का बड़ा मैदान बना लेते थे। दोनों अटारियों पर रानियों समेत वे काले सफेद वेशभूषाधारी पैदल, हाथी, घोड़ा, ऊंट सैनिकों को खानों में हर चाल पर वास्तव में जाने को निर्देश देते थे। सैनिकों को उनकी आज्ञाओं पर मरना पड़ता था। दो राजा कम बत्तीस याने तीस सैनिक एक खेल में मारे जाते थे। आज जब प्रजानन, राजनेता, पक्ष-विपक्षी शतरंज खेलते हैं तो कभी मण्डल, कभी कमण्डल, कभी अण्डल, कभी बण्डल, कहीं पंजाब, कहीं आसाम, कहीं कश्मीर में रोज काले-सफेद पैदल मारे जाते हैं ये घिनौना शतरंज फौरन बन्द होना चाहिए। जनता भले ही आठ पैदलीय शतरंजी पैदल हो; बुद्धिजीवी न तो पैदल बने, न इस व्यवस्था के हाथी, घोड़े, ऊंट ही बने।
शतरंज की हार सबसे बुरी हार होती है। जुए से भी बुरी हार। हारनेवाले की आत्मा तक गहरी उतर जाती है। एक बार मैं अन्ध विद्यालय के एक बच्चे से शतरंज में हार गया था। वह अन्धा बच्चा मेरी तुलना में शतरंज बोर्ड तथा मोहरों की स्थिति अधिक देख सकता था। उसकी ऊंगलियों में आंखें थीं। फैली हथेलियां हर मोहरे की स्थिति पकड़ लेती थीं। उसके दिमाग का शब्द चित्र महान था। मैं अपने कालेज का श्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ी हार गया था। वह गौरवमय हार थी। पर आज तक वह हार साए के समान मेरे साथ है। उस अन्धे चौदह वर्षीय शतरंज के खिलाड़ी में विश्व चॅम्पियन बनने की सम्भावनाएं थीं। पर व्यवस्था उससे ज्यादा अन्धी थी इसलिए उसे न देख सकी। खैर शतरंज की हार कभी नहीं भूलती।
राजनीति की हार भी कभी नहीं भूलती। हारा राजनीतिज्ञ आत्मा तक हिल जाता है। दुबारा लड़ता है। धरतीपकड़ नाम का एक उत्तम व्यक्तित्व अभी सत्रह स्थानों से लड़ा है। उस पर कई हारों का काला नशा है। उसे अभी तक समझ नहीं आई राजनैतिक शतरंज की। उसनें जनता को काला, गोरा, लाल, सफेद नहीं बांटा। जिसने पैदल मारनेवाले हाथी, घोड़े, ऊंट नहीं रचे वो भला प्रजातन्त्र शतरंज में क्या जीतेगा? उसे उम्रभर हारना है। उम्रभर चुनाव लड़ना है क्योंकि हार उसकी आत्मा तक पहुंच चुकी है। प्रजातन्त्र शतरंज में अरे बुद्धिजीवियों! तुम सब धरतीपकड़ हो। सर्वाधिक धरतीपकड़ कीड़े, मकोड़े, चींटी, दीमक आदि होते हैं। तुम्हारी हस्ती ही क्या है? पांच लाख मतों में चार-पांचसौ वोटों की। हा! अपने पे किसान, दीप, पंजे, कमल आदि का दाग लगवा लो तो हस्ती बढ़ जाएगी। चरवाह जानवरों को पहचाान के लिए दागता है। प्रजातन्त्र यही दगनी व्यवस्था है। दागित मत हो! मेरा आह्नान है गलत व्यवस्था के गलत आकलन से स्वयं को कम मत समझो। व्यवस्था तोड़ बनो। सुकरात, ब्रूनो, स्पिनोजा, गैलीलियो, दयानन्द बनो। राजनैतिक शतरंज की घिनौनी बिसात उलट दो।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
बी 512, सड़क-4, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-490020, (छत्तीसगढ़)
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