प्रजातन्त्र का जवाब हैं प्रजतन्त्र। प्रजतन्त्र ही स्वतन्त्र, स्वाधीन, स्वस्थ, स्वस्ति शब्दों को सार्थक कर सकता है। इसका आधार प्रजानन के स्थान पर “स्वानन” है । प्रजा में अपना चेहरा घोर विकृत प्रत्यय है। स्व में अपना चेहरा सटीक सही प्रत्यय है। "जो तुम हो वही है दूसरा" यही प्रजतन्त्र है। “आत्मा की उपमा से हर व्यवहार” है प्रजतन्त्र। “समस्त प्राणियों को आत्मवत जानना तथा उनसे आत्मवत व्यवहार तथा उनका उल्लंघन मात्रानुसार अपराध एवं दण्डनीय” यह प्रजतन्त्र का संविधान तथा कानून है। सरल एवं सहज कानून जो हर प्रज जानता है। यही प्रतिजन-तन्त्र है। प्रतिजन = प्रज = स्व = आदमी।
प्रति-जन-तन्त्र व्यवस्था है योग्यता व्यवस्था। एक स्कूल व्यवस्था के समान जहां शिक्षा ही योग्यता का आधार है। तथा डेढ़ हजार विधार्थियों को योग्यतानुसार क्रमबद्ध किया जा सकता है। ग्यारहवीं का सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति प्रथम उच्च श्रेणी पर तथा पहली का न्यूनतम अंक प्राप्त व्यक्ति सबसे निम्न सीढी पर रहता है।
उपरोक्त शिक्षांक योजना एवं अनुभवांक योजना के सम्मिश्र रूप के क्रमों पर हर सामाजिक को बांट देना ही प्रतिजनतन्त्र है या प्रजतन्त्र है।
प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र निदान है अशिक्षा का। इसमें शिक्षा द्वार से गुजरे बिना कोई सफल नहीं हो सकता। अतः नई पीढ़ी के आते आते हर व्यक्ति शिक्षित होगा ही।
प्रजतन्त्र निदान है विकृत दबाव समूहों का, हड़तालों का, मांगों का, बन्दों का, हुडदंगों का, चुनावी धोखों का, स्टण्टो का, इसमें निर्णय गुणवत्ता, आवश्यकता, बौद्धिकता पर लिए जाते हैं।
प्रजतन्त्र स्थाई, अस्थाई, व्यक्ति, योग्यता, अनुभव समन्वय है। 58 वर्ष पर सेवा निवृत्ति वह आधार है जो इसके स्वरूप को परिवर्तनीय बनाती है।
प्रजतन्त्र में आधार प्रत्यय “प्रज” = व्यक्ति है जिसमें थोडे प्रयास से बडी उन्नति व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर सकता है। प्रजातन्त्र में आधार प्रत्यय ”प्रजा“ है। जिसमें उन्नति, अवनति में वर्षों तक कोई अन्तर भी पता नहीं चलता।
हिटलर व्यवस्था “विकृत प्रजतन्त्र” थी। उसमें भी जर्मनी मानव ने अभूतपूर्व उन्नति की थी। जनता दो तिहाई ऋणावस्था से धनात्मक अवस्था तक पहुंची थी। विश्व के किसी सामान्य प्रजातन्त्र ने इतनी उन्नति नहीं की है। अधिकांश प्रजातन्त्र आजादी पश्चात् वर्ष दो वर्ष के कुल आप जितने ऋणांे में डूबे हैं निर्धन राष्ट्रों के शोषक राष्ट्रों की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। स्वस्थ ”प्रजतन्त्र“ ही विश्व मानव उन्नति का एकमात्र आधार है।
विश्व इतिहास गवाह है कि स्व-यम्, स्व-तन्त्र, स्व- आधीन, स्व-अस्ति, स्व-स्थ व्यक्ति ही महापुरुष हुए हैं। जो भी ”स्व“ से जुडा नहींे हैं वह इतिहास रचने के, नेता होने के अयोग्य है। प्रतिजन-तन्त्र या प्रज-तन्त्र या स्व-तन्त्र व्यवस्था स्व आधारित है। इसमें कई-कई इतिहास रचने के सम्भावनाएं हैं। प्रजातन्त्र इस अर्थ में बंजर है। इसके करीब-करीब सारे नेता इतिहास रचने के अयोग्य, प्रजामतों के द्वारा हत या छोटे किए गए होते हैं। प्रजतन्त्र में महापुरुष पूर्ण प्रजा से उच्च रहते अपने जीवन से उच्चता की ओर प्रेरित होती है। जनता स्वेच्छया उच्चता की ओर प्रेरित होती है। प्रजातन्त्र में व्यवस्था उलटी है। प्रजानन योग्यों को निम्नता देता है तथा अयोग्योें का मत बटोरने निम्न का समर्थन करता है।
”प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज“ लिखने का उद्देश्य प्रजातन्त्र को प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र या स्वतन्त्र द्वारा प्रतिस्थापित करना है। हर उस व्यक्ति से जो "प्रज" है "स्वयं" है यह अनुरोध है कि वह अपनी-अपनी प्रजता के लिए संघर्ष करे तथा प्रजातन्त्र समर्थित प्रजानन व्यवस्था समेत प्रजातन्त्र को समाप्त करने का प्रयास करे।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी, बी.ई., एल.एल.बी.,
डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
प्रति-जन-तन्त्र व्यवस्था है योग्यता व्यवस्था। एक स्कूल व्यवस्था के समान जहां शिक्षा ही योग्यता का आधार है। तथा डेढ़ हजार विधार्थियों को योग्यतानुसार क्रमबद्ध किया जा सकता है। ग्यारहवीं का सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति प्रथम उच्च श्रेणी पर तथा पहली का न्यूनतम अंक प्राप्त व्यक्ति सबसे निम्न सीढी पर रहता है।
उपरोक्त शिक्षांक योजना एवं अनुभवांक योजना के सम्मिश्र रूप के क्रमों पर हर सामाजिक को बांट देना ही प्रतिजनतन्त्र है या प्रजतन्त्र है।
प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र निदान है अशिक्षा का। इसमें शिक्षा द्वार से गुजरे बिना कोई सफल नहीं हो सकता। अतः नई पीढ़ी के आते आते हर व्यक्ति शिक्षित होगा ही।
प्रजतन्त्र निदान है विकृत दबाव समूहों का, हड़तालों का, मांगों का, बन्दों का, हुडदंगों का, चुनावी धोखों का, स्टण्टो का, इसमें निर्णय गुणवत्ता, आवश्यकता, बौद्धिकता पर लिए जाते हैं।
प्रजतन्त्र स्थाई, अस्थाई, व्यक्ति, योग्यता, अनुभव समन्वय है। 58 वर्ष पर सेवा निवृत्ति वह आधार है जो इसके स्वरूप को परिवर्तनीय बनाती है।
प्रजतन्त्र में आधार प्रत्यय “प्रज” = व्यक्ति है जिसमें थोडे प्रयास से बडी उन्नति व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर सकता है। प्रजातन्त्र में आधार प्रत्यय ”प्रजा“ है। जिसमें उन्नति, अवनति में वर्षों तक कोई अन्तर भी पता नहीं चलता।
हिटलर व्यवस्था “विकृत प्रजतन्त्र” थी। उसमें भी जर्मनी मानव ने अभूतपूर्व उन्नति की थी। जनता दो तिहाई ऋणावस्था से धनात्मक अवस्था तक पहुंची थी। विश्व के किसी सामान्य प्रजातन्त्र ने इतनी उन्नति नहीं की है। अधिकांश प्रजातन्त्र आजादी पश्चात् वर्ष दो वर्ष के कुल आप जितने ऋणांे में डूबे हैं निर्धन राष्ट्रों के शोषक राष्ट्रों की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। स्वस्थ ”प्रजतन्त्र“ ही विश्व मानव उन्नति का एकमात्र आधार है।
विश्व इतिहास गवाह है कि स्व-यम्, स्व-तन्त्र, स्व- आधीन, स्व-अस्ति, स्व-स्थ व्यक्ति ही महापुरुष हुए हैं। जो भी ”स्व“ से जुडा नहींे हैं वह इतिहास रचने के, नेता होने के अयोग्य है। प्रतिजन-तन्त्र या प्रज-तन्त्र या स्व-तन्त्र व्यवस्था स्व आधारित है। इसमें कई-कई इतिहास रचने के सम्भावनाएं हैं। प्रजातन्त्र इस अर्थ में बंजर है। इसके करीब-करीब सारे नेता इतिहास रचने के अयोग्य, प्रजामतों के द्वारा हत या छोटे किए गए होते हैं। प्रजतन्त्र में महापुरुष पूर्ण प्रजा से उच्च रहते अपने जीवन से उच्चता की ओर प्रेरित होती है। जनता स्वेच्छया उच्चता की ओर प्रेरित होती है। प्रजातन्त्र में व्यवस्था उलटी है। प्रजानन योग्यों को निम्नता देता है तथा अयोग्योें का मत बटोरने निम्न का समर्थन करता है।
”प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज“ लिखने का उद्देश्य प्रजातन्त्र को प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र या स्वतन्त्र द्वारा प्रतिस्थापित करना है। हर उस व्यक्ति से जो "प्रज" है "स्वयं" है यह अनुरोध है कि वह अपनी-अपनी प्रजता के लिए संघर्ष करे तथा प्रजातन्त्र समर्थित प्रजानन व्यवस्था समेत प्रजातन्त्र को समाप्त करने का प्रयास करे।
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी, बी.ई., एल.एल.बी.,
डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
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