Tuesday, September 14, 2010

"जनता की पसंद, व्यवस्था घटियाकरण और प्रजातंत्र"

"बाजारवाद" जनता आधारित है | बाजार में तरह-तरह की पुस्तकें पत्रिकाएं उपलब्ध हैं | इन पुस्तकों की श्रेष्ठता देखते तटस्थता और निष्पक्षता की कसौटी पर कस कर उनकी सूची बनाई जाए और जनता की पसंदानुसार सूची बनाई जाए तो पता चल जाता है की जनता कितनी समझदार है | यही स्थिति भोजन के बारे में भी है | सारे विकसित, अविकसित संसार में खाने के मामले में प्रजातंत्र ने लोगों को निगल-निगल खाना खिला स्थूल काय तथा रोगी किया है | "जन-पसंद" बड़ी ही घटिया चीज का नाम है | विश्व इन्टरनेट इसका गवाह है | अंधे महात्मा और उनको पसंद करती जनता इसकी गवाह है | फिल्मों के नग्न और बदन उडाऊ सितारे और इन्हें पसंद करती जनता इस की गवाह है | डॉक्टरों के प्रयास से बचे अमिताभ बच्चन द्वारा बचने के लिए तिरुपति पर नौ करोड़ का वह भी ब्रेसलेट चढाने जैसी महामूर्खता करना, अपनी पत्नी (गृह)  का खाना, पिता की कविताएं, दर्शकों की पसंद, मुंबई की आबोहवा आदि को नूरानी तेल  से पैसों के कारण घटिया बताना और इस के बाद भी जन-पसंद होना, बाहुबलियों, भ्रष्टों का चुनाव जीतना, संसद मीटिंगों का अर्ध चुनावाधारित Institution of Engineers की मीटिंगों से भी घटिया होना, संसद मीटिंगों का हर प्रशासनिक मीटिंगों से भी घटिया होना, बाजार में श्रेष्ठ पत्रिकाओं का चलन बंद होते चले जाना, वह भी प्रजातंत्र के प्रसार के समानुपात में बंद होते चले जाना आदि प्रमाण हैं की जनता कभी बढ़िया नहीं चुन सकती और न जनता में बढ़िया चुनने की क्षमता कभी आ सकती है | और प्रजातंत्री "चुनाव" का आधार जनता है | अतः प्रजातंत्र सीधा व्यवस्था का घटियाकरण है |

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