संसदीय प्रणाली की आत्मा है संसद। संसद का जीवित घटक है सांसद। सांसद जनप्रतिनिधि है। जन का अर्थ है प्रजा। खिचड़ी लोगों का नाम है प्रजा। खिचड़ी लोग जब एकल मताधिकार द्वारा अपनी अपनी सत्ता का हस्तान्तरण करते हैं तो जन-प्रतिनिधि चुने जाते हैं। विचारों की खिचड़ी व्यवस्था है राजनैतिक दल। संसद में संख्यानुसार राजनैतिक दलों को मान्यता मिलती है। फिर वहां दो पक्ष हो जाते हैं। एक सत्ता पक्ष दूसरा विपक्ष। सत्ता और विपक्ष भी आजकल खिचड़ी हो गए हैं। खिचड़ी बीमार का भोजन है। यदि यह खिचड़ी भी कंकड़भरी हो तो वह गरीब बीमार का भोजन हो जाती है। विश्व के प्रजातन्त्री देशों में संसद या संसदीय उपसंस्थाएं विधानसभा आदि कंकड़ी खिचड़ी हैं। यही कारण है कि विश्व की संसदों और विधानसभाओं में भयानक तू तू मैं मैं, गाली-गलौच, हाथापाई, शोर-शराबा, हंगामा, विचारहीनता आदि अतिआम बाते हैं। तथा कई बार तो ये स्थितियां कपड़े फाड़, साड़ी-फाड़, माईक-तोड़, धोती-उतार, कुर्सियां तोड़ आदि तक पहंुच जाती हैं।
प्रजातन्त्री आजादी की आम प्रवृत्ति मध्यमान गति औसतीकरण की ओर होती है। औसतीकरण में बहुभाग निम्नवर्ग, अशिक्षित भूखे, निर्धनों का होता है। जिनकी आम सोच पैसे और भूख तथा आवश्यकताओं तक ही होती है। ऐसे लोगों के बहुमत (प्रायः विजय 20-30 प्रतिशत आधार पर होती है) से चुने जन प्रतिनिधियों की योग्यता हमेशा संदिग्ध रहती है। चयनकर्ता स्वयं से श्रेष्ठ का चयन औसतः न तो करता है न तो कर सकता है। यह व्यक्तिगत नियम सार्वजनिक होकर औसतीकरण के कारण और घटिया हो जाता है। यही कारण है कि जन-प्रतिनिधियों की संसदें एक आखाड़ा बन जाती हैं।
ऑस्ट्रेलियन संसद में नेता प्रतिपक्ष ने पानी से भरा गिलास प्रधानमन्त्री को दे मारा था। जापान की डाईट (संसद) में इस सीमा तक खुली मारपीट हुई थी कि पुलिस बुलानी पड़ी थी। फ्रांस का सदन तो हंगामों के लिए प्रसिद्ध है। संसदों की जननी ब्रिटेन की पुरानी संसद का इतिहास खून से रंगा है। अब भी वहां यदा कदा हंगामा शोरगुल हो जाता है। भारतीय संसद वर्ष 2001 में बजट सत्र में 74 घंटे, मानसून सत्र में 28 घंटे, शरद सत्र में 15 घंटे हंगामे के कारण नहीं चली। उत्तरप्रदेश में 1998 में विधानसभा का लहूलुहान खुनी काण्ड हुआ। कई विधायक घायल हुए। जुलाई 2000 में महाराष्ट्र विधानसभा में माईकों, पेपरवेटों, कुर्सियों के हाथियारों से जंग लड़ी गई। वर्ष 2001 में मध्यप्रदेश विधानसभा 5 दिन तक नहीं चली। नगरपालिकाओं, पंचायतों, निगमों की स्थितियां इससे भी बदतर हैं। सदन कुण्ड में जाने, हंगामा करने, चिल्लाने, बैठकें स्थगित कराने, पक्ष-विपक्ष को नहीं बोलने देने, अभिभाषण विरोध आदि दैनंदिनी की बातें हैं।
राजनैतिक दलों का इस सबको समर्थन है। इसलिए पिछले पचास वर्षों में किसी भी राजनैतिक दल ने किसी भी सदस्य को हंगामे, उद्दण्डता, मारपीट, लड़ाई, गाली-गलौंच के लिए दंडित नहीं किया। प्रजातन्त्र चुनाव की भी यही भाषा है कि हंगामादारों के लिए दुबारा चुनाव जीतना आसान होता है। बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? जया, लालू सर्वाधिक प्रसिद्ध, विश्वप्रसिद्ध मुख्यमन्त्री है।
प्रजातन्त्र का सिद्धान्त है कि जन- जनप्रतिनिधि को सत्ता हस्तांतरित करते हैं। एक पत्नी अपने पति को या पति अपने पत्नी को, पिता पुत्र को या पुत्र पिता को, मित्र मित्र को भी पूरी सत्ता हस्तांतरित नहीं कर सकता है। इनका संबंध अतिसीमित व्यक्ति व्यक्ति स्तर का रहता है। वास्तव में हर व्यक्तित्व अपूर्व तथा विशिष्ट है। प्रजातन्त्र में जन (कई व्यक्ति) जनप्रतिनिधि को राष्ट्र सन्दर्भ या प्रान्त या नगर सन्दर्भ में सत्ता हस्तांतरण करते हैं। जो वास्तव में कभी नहीं होता। कोई भी जनप्रतिनिधि प्रजातन्त्री इतिहास में इतना बड़ा नहीं हुआ है जिसे स्वेच्छया सच्चे तौर पर जन ने सत्ता हस्तांतरित की हो। प्रजातन्त्र धर्म निरपेक्ष होता है जबकि धर्म में स्वतः सत्ता हस्तांतरण होता है कि उसमें श्रद्धा या अन्धश्रद्धा का बोलबाला रहता है। धार्मिक सत्ता हस्तांतरण प्रायः दीर्घकाल में मुर्दा महापुरुषों को जिलाए रखने के लिए अपनी हस्ती बचाने के लिए कुछ धूर्तों द्वारा चलाए आन्दोलन के कारण होता है। सच्चे धर्म में सत्ता हस्तांतरण मात्र ब्रह्म को होता है। सत्ता हस्तांतरण प्रजातन्त्र की एक कमजोर कड़ी है जो प्रजातन्त्र को मजाक बनाकर रख देती है।
यदि धोखे से गलती से सत्ता हस्तांतरण की बात मान भी ली जाए तो भी प्रजातन्त्र एक बकवास व्यवस्था ठहरती है कि इसमें जनप्रतिनिधि को बीस प्रतिशत तो सत्ता हस्तान्तरण होता है। अस्सी प्रतिशत तो सत्ता अहस्तान्तरण होता है। अतः जनप्रतिनिधि अ-जन प्रतिनिधि होता है।
इस प्रकार प्रजातन्त्र की संसदीय प्रणाली में जो जनप्रतिनिधि आधारित हैं कंकड़ीय खिचड़ी हो जाती है जो किसी के खानेलायक नहीं होती। इसी कारण संसदीय प्रणाली में किए गए सुधार प्रयास संसद द्वारा ही रौंद दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्ताव पास हुआ कि सदन के गर्भगृह में जानेवाला विधायक स्वतः सात दिवस निलंबित माना जाएगा। और तीसरे या चौथे दिन ही गर्भ गृह में उस प्रस्ताव का कचूमर निकल गया। 1992 में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा ग्यारह सूत्री अनुशासन नियम सदन सदस्यों हेतु आम सहमति से (प्रजातन्त्र व्यवस्था के उच्चतम प्रारूप से) बनाए गए पर आज तक उन नियमों की सारे सदस्य (कभी पक्ष कभी विपक्ष) सरे आम हत्या ही करते रहे हैं। वर्तमान में साठसूत्रीय आचरण संहिता लोक सभाध्यक्ष द्वारा उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, नेता प्रतिपक्ष, संसद विधानसभा के पीठाधीन अधिकारी राज्यों के मुख्यमन्त्रियों तथा विपक्ष नेताओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार की है। अभी सत्र शुरु नहीं हुआ है पर विपक्ष के प्रवक्ताओं ने दूरदर्शन पर पहले ही साठ सूत्रों की हत्या या उग्रविरोध की योजना प्रस्तुत कर दी है।
संसद सत्र के पहले दिन ही साठसूत्री अनुशासन तहस नहस फहस सड़स होकर रह गया। मैंने देखा संसद भव्य है। आलीशान कुर्सियां तहदार आधारपीठ गद्देदार है। धूल रहित भवनस्वच्छता पंचतारा होटल मात अर्थात सप्ततारा है। माईक व्यवस्था विश्वश्रेष्ठ है। महापुरुषों के चित्र स्वच्छपाक हैं। व्यवस्था सुनियाजित, क्रमबद्ध, पाकसाफ, अघोरचक्षुणी है। यह प्रजातन्त्र का आलीशान मन्दिर है। हर कोना, हर ओर, हर छोर भव्य है स्वच्छ है। और इसके कुछ देवता तितिर बितिर कुर्सियों पर विद्यमान हैं। और बाकी हाथ उठा-उठा चिल्ला रहे हैं। यहां से बदस्वाद बाजार से भी घटिया खिचड़ी शोर है। सब्जी बाजारी शोर अपनी अपनी सब्जी भाव चिल्लाने बेचने का शोर होता है। यहां तो कीचड़ उछाल शोर है। जड़भवन, कुर्सियां, चित्र, सप्ततारा सफाई, माईक व्यवस्था पशुघटिया आदमी सहजतः अपमानित कर देता है।
यही माहौल जड़-भवन, कुर्सियों, चित्रों, सप्ततारा सफाई तथा मखौल दूसरे या तीसरे दिन भी रहा। पांच मिनट में संसद सभा स्थगित हो गई ग्यारह पांच बजे यह हुआ। ग्यारह पच्चीस संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। भिलाई में स्मृतिनगर में संगम होटल के सामने बातचीत में कुछ व्यक्तियों ने कहा- ”साले सारे मर गए होते तो अच्छा था“। मैं चलते चलते रुक गया। मैंने कहा- ”उससे होगा क्या? सब दुबारा तिबारा हो जाएंगे पैदा। प्रजातन्त्र है इनकी कु-माता। प्रजा है इनका कु-पिता। व्यवस्था हत्या है इलाज इसका।“ और उनके हाथ प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज का पत्रक मैंने दिया थमा।
लौटा मैं सोचता सोचता कब होगी प्रजातन्त्र हत्या?
कहावत है एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा करती है। संकीर्ण विचार मानव समाज की गंदी मछली है। सम्प्रदाय (मैं भर ठीक) गंदी मछली समूह है। इसी प्रकार राजनैतिक दल (मेरी टोपी ठीक) गंदी मछली समूह है। साहित्य में प्रतिबद्धता या वाद गंदी मछली समूह है। दबाव समूह गंदी मछली समूह है। प्रजातन्त्र का आधार गंदी मछली समूह का स्वीकार है। इससे सारा का सारा देश तालाब ही गंदला हो जाता है, हो रहा है। देश बचाओ, प्रजातन्त्र हटाओ, प्रतिजनतन्त्र लाओ!
प्रजातन्त्री आजादी की आम प्रवृत्ति मध्यमान गति औसतीकरण की ओर होती है। औसतीकरण में बहुभाग निम्नवर्ग, अशिक्षित भूखे, निर्धनों का होता है। जिनकी आम सोच पैसे और भूख तथा आवश्यकताओं तक ही होती है। ऐसे लोगों के बहुमत (प्रायः विजय 20-30 प्रतिशत आधार पर होती है) से चुने जन प्रतिनिधियों की योग्यता हमेशा संदिग्ध रहती है। चयनकर्ता स्वयं से श्रेष्ठ का चयन औसतः न तो करता है न तो कर सकता है। यह व्यक्तिगत नियम सार्वजनिक होकर औसतीकरण के कारण और घटिया हो जाता है। यही कारण है कि जन-प्रतिनिधियों की संसदें एक आखाड़ा बन जाती हैं।
ऑस्ट्रेलियन संसद में नेता प्रतिपक्ष ने पानी से भरा गिलास प्रधानमन्त्री को दे मारा था। जापान की डाईट (संसद) में इस सीमा तक खुली मारपीट हुई थी कि पुलिस बुलानी पड़ी थी। फ्रांस का सदन तो हंगामों के लिए प्रसिद्ध है। संसदों की जननी ब्रिटेन की पुरानी संसद का इतिहास खून से रंगा है। अब भी वहां यदा कदा हंगामा शोरगुल हो जाता है। भारतीय संसद वर्ष 2001 में बजट सत्र में 74 घंटे, मानसून सत्र में 28 घंटे, शरद सत्र में 15 घंटे हंगामे के कारण नहीं चली। उत्तरप्रदेश में 1998 में विधानसभा का लहूलुहान खुनी काण्ड हुआ। कई विधायक घायल हुए। जुलाई 2000 में महाराष्ट्र विधानसभा में माईकों, पेपरवेटों, कुर्सियों के हाथियारों से जंग लड़ी गई। वर्ष 2001 में मध्यप्रदेश विधानसभा 5 दिन तक नहीं चली। नगरपालिकाओं, पंचायतों, निगमों की स्थितियां इससे भी बदतर हैं। सदन कुण्ड में जाने, हंगामा करने, चिल्लाने, बैठकें स्थगित कराने, पक्ष-विपक्ष को नहीं बोलने देने, अभिभाषण विरोध आदि दैनंदिनी की बातें हैं।
राजनैतिक दलों का इस सबको समर्थन है। इसलिए पिछले पचास वर्षों में किसी भी राजनैतिक दल ने किसी भी सदस्य को हंगामे, उद्दण्डता, मारपीट, लड़ाई, गाली-गलौंच के लिए दंडित नहीं किया। प्रजातन्त्र चुनाव की भी यही भाषा है कि हंगामादारों के लिए दुबारा चुनाव जीतना आसान होता है। बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? जया, लालू सर्वाधिक प्रसिद्ध, विश्वप्रसिद्ध मुख्यमन्त्री है।
प्रजातन्त्र का सिद्धान्त है कि जन- जनप्रतिनिधि को सत्ता हस्तांतरित करते हैं। एक पत्नी अपने पति को या पति अपने पत्नी को, पिता पुत्र को या पुत्र पिता को, मित्र मित्र को भी पूरी सत्ता हस्तांतरित नहीं कर सकता है। इनका संबंध अतिसीमित व्यक्ति व्यक्ति स्तर का रहता है। वास्तव में हर व्यक्तित्व अपूर्व तथा विशिष्ट है। प्रजातन्त्र में जन (कई व्यक्ति) जनप्रतिनिधि को राष्ट्र सन्दर्भ या प्रान्त या नगर सन्दर्भ में सत्ता हस्तांतरण करते हैं। जो वास्तव में कभी नहीं होता। कोई भी जनप्रतिनिधि प्रजातन्त्री इतिहास में इतना बड़ा नहीं हुआ है जिसे स्वेच्छया सच्चे तौर पर जन ने सत्ता हस्तांतरित की हो। प्रजातन्त्र धर्म निरपेक्ष होता है जबकि धर्म में स्वतः सत्ता हस्तांतरण होता है कि उसमें श्रद्धा या अन्धश्रद्धा का बोलबाला रहता है। धार्मिक सत्ता हस्तांतरण प्रायः दीर्घकाल में मुर्दा महापुरुषों को जिलाए रखने के लिए अपनी हस्ती बचाने के लिए कुछ धूर्तों द्वारा चलाए आन्दोलन के कारण होता है। सच्चे धर्म में सत्ता हस्तांतरण मात्र ब्रह्म को होता है। सत्ता हस्तांतरण प्रजातन्त्र की एक कमजोर कड़ी है जो प्रजातन्त्र को मजाक बनाकर रख देती है।
यदि धोखे से गलती से सत्ता हस्तांतरण की बात मान भी ली जाए तो भी प्रजातन्त्र एक बकवास व्यवस्था ठहरती है कि इसमें जनप्रतिनिधि को बीस प्रतिशत तो सत्ता हस्तान्तरण होता है। अस्सी प्रतिशत तो सत्ता अहस्तान्तरण होता है। अतः जनप्रतिनिधि अ-जन प्रतिनिधि होता है।
इस प्रकार प्रजातन्त्र की संसदीय प्रणाली में जो जनप्रतिनिधि आधारित हैं कंकड़ीय खिचड़ी हो जाती है जो किसी के खानेलायक नहीं होती। इसी कारण संसदीय प्रणाली में किए गए सुधार प्रयास संसद द्वारा ही रौंद दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्ताव पास हुआ कि सदन के गर्भगृह में जानेवाला विधायक स्वतः सात दिवस निलंबित माना जाएगा। और तीसरे या चौथे दिन ही गर्भ गृह में उस प्रस्ताव का कचूमर निकल गया। 1992 में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा ग्यारह सूत्री अनुशासन नियम सदन सदस्यों हेतु आम सहमति से (प्रजातन्त्र व्यवस्था के उच्चतम प्रारूप से) बनाए गए पर आज तक उन नियमों की सारे सदस्य (कभी पक्ष कभी विपक्ष) सरे आम हत्या ही करते रहे हैं। वर्तमान में साठसूत्रीय आचरण संहिता लोक सभाध्यक्ष द्वारा उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, नेता प्रतिपक्ष, संसद विधानसभा के पीठाधीन अधिकारी राज्यों के मुख्यमन्त्रियों तथा विपक्ष नेताओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार की है। अभी सत्र शुरु नहीं हुआ है पर विपक्ष के प्रवक्ताओं ने दूरदर्शन पर पहले ही साठ सूत्रों की हत्या या उग्रविरोध की योजना प्रस्तुत कर दी है।
संसद सत्र के पहले दिन ही साठसूत्री अनुशासन तहस नहस फहस सड़स होकर रह गया। मैंने देखा संसद भव्य है। आलीशान कुर्सियां तहदार आधारपीठ गद्देदार है। धूल रहित भवनस्वच्छता पंचतारा होटल मात अर्थात सप्ततारा है। माईक व्यवस्था विश्वश्रेष्ठ है। महापुरुषों के चित्र स्वच्छपाक हैं। व्यवस्था सुनियाजित, क्रमबद्ध, पाकसाफ, अघोरचक्षुणी है। यह प्रजातन्त्र का आलीशान मन्दिर है। हर कोना, हर ओर, हर छोर भव्य है स्वच्छ है। और इसके कुछ देवता तितिर बितिर कुर्सियों पर विद्यमान हैं। और बाकी हाथ उठा-उठा चिल्ला रहे हैं। यहां से बदस्वाद बाजार से भी घटिया खिचड़ी शोर है। सब्जी बाजारी शोर अपनी अपनी सब्जी भाव चिल्लाने बेचने का शोर होता है। यहां तो कीचड़ उछाल शोर है। जड़भवन, कुर्सियां, चित्र, सप्ततारा सफाई, माईक व्यवस्था पशुघटिया आदमी सहजतः अपमानित कर देता है।
यही माहौल जड़-भवन, कुर्सियों, चित्रों, सप्ततारा सफाई तथा मखौल दूसरे या तीसरे दिन भी रहा। पांच मिनट में संसद सभा स्थगित हो गई ग्यारह पांच बजे यह हुआ। ग्यारह पच्चीस संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। भिलाई में स्मृतिनगर में संगम होटल के सामने बातचीत में कुछ व्यक्तियों ने कहा- ”साले सारे मर गए होते तो अच्छा था“। मैं चलते चलते रुक गया। मैंने कहा- ”उससे होगा क्या? सब दुबारा तिबारा हो जाएंगे पैदा। प्रजातन्त्र है इनकी कु-माता। प्रजा है इनका कु-पिता। व्यवस्था हत्या है इलाज इसका।“ और उनके हाथ प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज का पत्रक मैंने दिया थमा।
लौटा मैं सोचता सोचता कब होगी प्रजातन्त्र हत्या?
कहावत है एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा करती है। संकीर्ण विचार मानव समाज की गंदी मछली है। सम्प्रदाय (मैं भर ठीक) गंदी मछली समूह है। इसी प्रकार राजनैतिक दल (मेरी टोपी ठीक) गंदी मछली समूह है। साहित्य में प्रतिबद्धता या वाद गंदी मछली समूह है। दबाव समूह गंदी मछली समूह है। प्रजातन्त्र का आधार गंदी मछली समूह का स्वीकार है। इससे सारा का सारा देश तालाब ही गंदला हो जाता है, हो रहा है। देश बचाओ, प्रजातन्त्र हटाओ, प्रतिजनतन्त्र लाओ!
डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शाóी,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)
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