"ऋणं कृत्वा घृतं पीत्वा" चार्वाक वाक्य था |
"ऋणं कृत्वा मात्र जीत्वा" प्रजातंत्र वाक्य है |
गृह ऋण, शिक्षा ऋण, खेती ऋण, कार ऋण, स्कूटर ऋण, मोबाइल ऋण प्रजातंत्र का नाम हि ऋण है | हर व्यक्ति यहाँ ऋणी है | ऋणधारियों के चित्रों से यहाँ पन्नों के पन्ने भरे रहते हैं | लाखों परिवार बर्बाद हैं | इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक अपना आधे से अधिक वेतन ऋण पटाने में व्यय करते हैं, ऊँचे मकानों में रहते हैं, कार चलते हैं, मोबाइल झूमते हैं और घर में जुच्चा-फुस्सा पकवान खाते हैं | फल खरीदते डरते हैं | इतनी मूर्ख आर्थिक व्यवस्था विश्व में कभी न थी | अभी तो किसानों से शुरुआत हुई यह ऋण-आत्महत्या परंपरा ऊपर वर्ग भी फैलना शुरु हुई है |
"ऋणं कृत्वा मात्र जीत्वा" प्रजातंत्र वाक्य है |
गृह ऋण, शिक्षा ऋण, खेती ऋण, कार ऋण, स्कूटर ऋण, मोबाइल ऋण प्रजातंत्र का नाम हि ऋण है | हर व्यक्ति यहाँ ऋणी है | ऋणधारियों के चित्रों से यहाँ पन्नों के पन्ने भरे रहते हैं | लाखों परिवार बर्बाद हैं | इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक अपना आधे से अधिक वेतन ऋण पटाने में व्यय करते हैं, ऊँचे मकानों में रहते हैं, कार चलते हैं, मोबाइल झूमते हैं और घर में जुच्चा-फुस्सा पकवान खाते हैं | फल खरीदते डरते हैं | इतनी मूर्ख आर्थिक व्यवस्था विश्व में कभी न थी | अभी तो किसानों से शुरुआत हुई यह ऋण-आत्महत्या परंपरा ऊपर वर्ग भी फैलना शुरु हुई है |
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