Showing posts with label 006 Prajatantra hatya ki dastavej. Show all posts
Showing posts with label 006 Prajatantra hatya ki dastavej. Show all posts

Wednesday, September 15, 2010

"आर्थिक सुरक्षा एवं प्रजातंत्र"

"ऋणं कृत्वा घृतं पीत्वा" चार्वाक वाक्य था |
"ऋणं कृत्वा मात्र जीत्वा" प्रजातंत्र वाक्य है |
गृह ऋण, शिक्षा ऋण, खेती ऋण, कार ऋण, स्कूटर ऋण, मोबाइल ऋण प्रजातंत्र का नाम हि ऋण है | हर व्यक्ति यहाँ ऋणी है | ऋणधारियों  के चित्रों से यहाँ पन्नों के पन्ने भरे रहते हैं | लाखों परिवार बर्बाद हैं | इंजीनियर, डॉक्टर, प्रबंधक अपना आधे से अधिक वेतन ऋण पटाने में व्यय करते हैं, ऊँचे मकानों में रहते हैं, कार चलते हैं, मोबाइल झूमते हैं और घर में जुच्चा-फुस्सा पकवान खाते हैं | फल खरीदते डरते हैं | इतनी मूर्ख आर्थिक व्यवस्था विश्व में कभी न थी | अभी तो किसानों से शुरुआत हुई यह ऋण-आत्महत्या परंपरा ऊपर वर्ग भी फैलना शुरु हुई है |