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Thursday, September 30, 2010

“अनात्म व्यवहारू, आत्म-हत्यारू है प्रजानन”

     अनात्म व्यवहारू है प्रजानन। प्रजानन सर्वाधिक अनात्मा या आत्महना होता है। आत्मवत व्यवहार सारे धर्मों की आत्मा है। आत्मवत व्यवहार का सार यह है कि- करो वह ही व्यवहार दूसरे के साथ जो उस परिस्थिति तुम चाहते हो कि दूसरे करें तुम्हारे साथ नकारात्मक सूत्र रूप में मत करो वह व्यवहार दूसरे के साथ जो तुम नहीं चाहते कोई दूसरा करे तुम्हारे साथ 
        एक गर्भवती प्रसूता निकट महिला, एक परीक्षा देने जाता छात्र, एक अस्पताल जाता मरीज, अत्यावश्यक कार्य पर जाता मनुष्य तो मनुष्य सड़क पर नियमबद्ध अपने रास्ते जाता आम आदमी भी कभी नहीं चाहता कि अचानक अकारण उसे रोक दिया जाए। पर प्रजानन वह जीव है जो उपरोक्त सबको अपनी सुरक्षा के बहाने रुकवा देता है। घोर आत्महना है प्रजानन, आत्म-हत्यारू प्रजानन।